Thursday, 17 August 2017

एहसास

तूने कॉलेज की.खिड़की पर फेंका है जो पत्थर \
और चूर चूर हो गया है काँच
ये बिखरे टुकड़े नहीं काँच के बल्कि बिखरे पड़े हैं सपने
जो तुम्हारे लिए देखे हैं माँ बाप ने
कि  बेटा पढ़ेगा लिखेगा कमाएगा खूब नाम
ये तूने  घोंप डाला है  जो किसी को खंज़र
और टपक पड़े  हैं सड़क पर लहू के कतरे
ये कतरे नहीं हैं कतरे केवल लहू के
बल्कि दास्तां बयां करते हैं क़त्ल हुए उन सपनों की
तुमाहरी उंगलियों के बीच शान से कसी वो सिगरेट और
हर काश के साथ निकलते वो धुंए उन लच्छों
में है बेबस मां की सिसकियां और बाप की थमती साँसे

तुम्हारा पत्थर फैंकना भी हो सकता था जायज़
मगर तभी अगर वो पत्थर तुमहारा होता
पर अफसोस! वो पत्थर तुम्हारा न था
तुम्हारा तो सिर्फ हाथ था
हाथ तुम्हारा था, पत्थर उनका था
हाथ तुम्हारा था, खंजर उनका था
वो सिगरेट, वो धुंआ  सब उनका था

एक दिन आएगा जब तुम छताओगे
तब तुम्हें एहसास होगा
काश! मेरे हाथ में पत्थर न होता
मेरे हाथ में कलम होती
मेरे हाथ में कागज़ होता
तो मैं एक नक्शा बनाता
नक्शा बनाता एक हिंदोस्तान का
पर तब शायद बहुत देर हो चुकी होगी
जब तुम्हें एहसास होगा -
क्या होता है माँ बाप के सपनों का मर जाना
और क्या  होता है माँ बाप के होंठों से हंसी का चले जाना



Sunday, 12 March 2017

अगर शब्द न होते...

खुदा ने इंसान को ज़ुबान दी, ज़ुबान के साथ ऐसा श्वस्नतंत्र दिया जिसका इस्तेमाल वह बोलने के लिए करता है। बोलने के लिए शब्द चाहिए। अपने ख़्यालों के इज़हार के लिए भी शब्द चाहिए। अगर शब्द न होते तो हम अपने ख्यालों को कैसे लिख पाते। शब्द न होते तो न ही किताबें लिखी जाती और न ही कुछ पढ़ने को होता। हम आज की तरह एस एम एस न कर पाते, न फ़ैसबुक पर कोई अपनी बात लिख कर स्टेटस डाल पाते। न ही कोई वट्सऐप पर चैट कर पाता, न कोई ट्वीट कर पाता। हम केवल फ़ोटो अपलोड कर पाते। हम इतनी सुगमता से पुराने यार दोस्तों को न खोज पाते। तब कुछ याद रह जाता और बहुत कुछ भूल जाता। कुछ भूली और कुछ बिसरी बातें शेष रह जाती। ये यादों के अफ़साने कुछ ही समय बाद दफ़्न हो जाते। कुछ अफ़सानों की कबरें होतीं तो कुछ कबरों के अफ़साने होते। ज़रा कल्पना कीजिए! अगर शब्द न होते तो इंसानों की दुनिया कैसी होती।
शब्द न होते तो हम अपनी बात कैसे कह पाते? हमारी भाषा कैसी होती? हम अपने सुख, दुख, खुशी, उत्साह, न्राराज़गी व गुस्से को कैसे व्यक्त करते? हमारी भाषा भी शायद वनों में में विचरण करने वाले प्राणियों की तरह होती, पालतु जन्तुओं की तरह होती और आकाश में विचरण करते पंछियों की तरह होती। हम अगर गुस्सा करते तो कुत्ते की तरह गुर्राते और चिल्लाना चाहते तो शायद उसी की तरह भौंकते। खुश होते तो इसका इज़हार शायद घोड़े की तरह हिनहिना कर करते या फ़िर गधे की तरह ढेंचु ढेंचु करते। ऐसे में इज़हारे मोहब्ब्त कैसे करते? शायद आंखों के ईशारे से ही सब कुछ समझना पड़ता और दिल जीतने का ये हुनर भी सीखना पड़ता क्योंकि न खत लिख पाते न वैलेंटाइन डे पर ग्रीटिंग कार्ड दे पाते। तब प्रेम कहानी तोता-मैना जैसी ही होती। अगर कोई कोयल की तरह कूक पाता तो उसे लता और रफ़ी की तरह अच्छा गायक समझा जाता। तब गीत न होते और अगर संगीत होता तो मंद मंद बहती हवा का होता, कल कल करते नालों का होता और झर झर करते झरनों का होता।
अगर शब्द न होते हम भला कैसे होते? बिना शब्दों की दुनिया में हम या तो मिस्टर बीन की तरह होते या चार्ली चैपलिन की तरह होते या फ़िर माइम के किसी एक्टर की तरह। आप किसी गूंगे की कल्पना भी कर सकते हैं। टीवी पर केवल ईशारों से ही समाचार दिखाये जाते और सिनेमा के रुपहले पर्दे की कहानी आलामारा से आगे न बढ़ती। तब केवल चार्ली चैपलिन या मिस्टर बीन जैसे ही अदाकार दिखते। तब कैसा लोकतंत्र होता? उस लोकतंत्र में विरोध के नारे न लगते, न कोई लिखित बैनर होते, न तख्तियों के सहारे कोई अपनी भड़ास निकाल पाता। तब शायद आदमी बंदरों के किसी दल की तरह शोर मचाते। ऐसे में कोई ब्यान न दे पाता और न ब्यान पर बवाल होता न सियासत। ऐसे में अभिव्यक्ति की आज़ादी कौन बात करता और क्या बात करता? तब न कोई अखबार होता, न कोई लिखता और न कोई पढ़ता। तब साहित्य कैसा होता? शायद होता ही नहीं।


तो बताइए क्या वो शब्दों के बगैर दुनिया हमारी शब्दों से बेहतर होती? वो दुनिया अलग ज़रूर होती, बेहतर नहीं या यों कहिए कि वो दुनिया अधूरी और निरस होती। सचमुच शब्द हमारी दुनिया को कई तरह के रंगों से भरते हैं। ये हमारी ज़िंदगी को नया आयाम देते हैं। शब्दों से हम समझते भी है और समझाते भी हैं। शब्द अपने आप में शक्ति हैं और किसी को भी शक्ति प्रदान करते हैं। ये शब्द आपकी भी शक्ति बन सकते हैं। कोई समझ ले तो एक शब्द भी जीवन बदल देता है, न समझो तो लाखों शब्द भी निरर्थक हैं। शब्द घाव भी देते हैं और घावों पर मरहम भी लगाते हैं।
शब्द आज़ाद है, पर उनका चुनाव करने के लिए आपको विवेकपूर्ण होना पड़ेगा। शब्द आप सुनते या पढ़ते ही नहीं, बल्कि वे एहसास दिलाते हैं। शब्दों की शक्ति असीम होती है। शब्द युद्ध और शान्ति दोनों करवाते हैं। कागज़ पर उतारे गए और मुंह बोले गये शब्द दुनिया में उथल पुथल मचा सकते हैं। शब्द धरा पर नहीं, दिलों पर पड़ते हैं और फ़िर बीज बन जाते हैं जिससे महाभारत जैसे युद्ध के भयानक वृक्ष भी अंकुरित हो सकते हैं या फ़िर विश्वशांति के पौधे। शब्द विध्वंसक परमाणु बम भी बन सकते हैं या पीड़ा से मुक्ति और मन को शीतलता देने वाली औषधि भी ।
बहुत नासमझ होते हैं वो जो कहते हैं - शब्दों में क्या रखा है? इतिहास गवाह है कि दुनिया को दिशा देने वाले वही लोग थे जो शब्दों की अहमियत को समझते थे। अच्छे शब्द बहुमूल्य होते हैं और उनके इस्तेमाल में कोई खर्च नहीं आता। शब्दों के चयन में की गयी चंद लम्हों की गलतियों के कारण सदियों पछताना पड़ता है। ज़ुबान में हड्डी नहीं, परन्तु इससे उगले हुए शब्द के तीर दिल को भेद कर रख देते हैं। कहा भी है - ख़ुदा को पसंद नहीं सख्तियां ज़ुबान की, इस लिए हड्डी नहीं ज़ुबान की।

Tuesday, 7 March 2017

लैफ़्ट-राइट, असहिष्णुता और अभिवयक्ति की आज़ादी

पिछले कई महीनों से देश में एक बहस चल रही है जो अभिव्यक्ति की आज़ादी, सहिष्णुता और असहिष्णुता के इर्द गिर्द घूमती रही है। हालांकि यह बहस कम है और शोर ज़्यादा लगता है। इस बहस को राजनीतिक दल, मिडिया चैनल्स व सोशल मिडिया अपने-अपने ढंग व सुविधा से परिभाषित करते रहे हैं और अपनी-अपनी सुविधा व फ़ायदे के अनुसार हवा दे रहे हैं। मुझे शरद जोशी का वयंग्य ’अंधों का हाथी’ याद आया जिसमें चार अंधे इस बात पर बहस छेड़ देते हैं कि हाथी कैसा है।
कोई मिडिया चैनल अपने चैनल् का पर्दा इतना काला कर देता है जैसे देश में अंधेरे के सिवाय कुछ नहीं बचा है। कुछ चैनल्स इतनी बुलंद आवाज़ में चिल्लाते रहते हैं मानो देश के कोने कोने में अच्छे दिन आ गये हैं। कई लेखकों को तो अचानक लगने लगा कि देश में एमरजैंसी जैसे हालात बन गये हैं और उनकी अभिव्यक्ति की आज़ादी इस कदर दबायी जा रही है कि उन्होंने अपने ईनामा वापस लौटा कर अपना गुस्सा ज़ाहिर किया। कुछ को आज़ाद भारत इतना बुरा लगने लगा है कि उन्हें अपने देश में रहने से डर लगने लगा है और इंडिया को इन्क्रेडिबल इंडिया कहने वालों को भी इसकी क्रेडिबिलिटी पर शक होने लगा है। कुछ इतने देश भक्त निकलते हैं कि असहिष्णुता की बात करने वालों को देशद्रोही करार देने में वक्त नहीं लेते और देश छोड़ने का फ़तवा नहीं तो सलाह तो दे ही देते हैं। कुछ को लगने लगा कि भारत माता की जय बोलेंगे तो उनका अधिकार छिन जाएगा, तो कुछ देश के टुकड़े-टुकड़े करने वाले और कश्मीर की आज़ादी के नारों को अभिव्यक्ति की आज़ादी करार देने पर अड़े हैं। हर वर्ष पंद्र्ह अगस्त को देश की आज़ादी का जश्न मनाने के बाद आज़ भी इन्हें कश्मीर की आज़ादी चाहिए। कोई कनैहिया बुराई से लड़ने वाला सुदर्शन चक्र धारी कृष्ण दिखाई देता है तो किसी किसी को उसकी आज़ादी की आवाज़ से देशद्रोह की गंध आने लगी है। संविधान व न्याय की बात करते करते फ़ैसला आने से पहले ही मिडिया व नेता उसे या तो देशद्रोही कहने लगे या फ़िर मसीहा।
सिक्कों के बल पर देश के कानून के दांव पेंच खेलकर जो कई रसूकदार लोग कत्ल के इल्ज़ाम से बरी हो जाते हैं वे भी इस देश में अपनी आज़ादी को छिना हुआ महसूस करता है और दहशत फ़ैलाने वालों को दहशतगर्द कहने से कतराते है। बेकसूर लोगों का कत्ल करने वाले याकूब मेमन जैसे आतंकवादी को बचाने लिए अपने आप को संविधान का पुजारी कहने वाले आधी रात को भी देश की सर्वोच्च अदालत का दरवाज़ा खटखटाते हैं और खुद को सैक्युलर और सहिष्णु साबित करते हैं। काश इतनी ही शिद्दत से वे गरीब, बेकस लोगों को इंसाफ़ दिलाने के लिए भी न्यालय के दरवाज़े खटखटाए जाते!
इस सारे शोर शराबे में कोई लैफ़्ट चलने लगा है और कोई राइट। इस लैफ़्ट-राइट के मार्च में दोनों तरफ़ एक भीड़ लगने लगी है और इस भीड़ में से हट कर जो राजनीति के डिब्बे से बाहर आ कर अपनी बात कहता है उसे ये भीड़ या इधर खींच रही है या उधर ठेल रही है। उसे कई तरह की संज्ञाएं दी जाने लगी है। किसी को कोई फ़ासिस्ट कह रहा है, तो किसी को नक्सली होने का प्रमाणपत्र मिल रहे हैं। किसी को संघी बत्ताया जाने लगा है और किसी को माओवादी। जिस दिन मैने नोटबंदी पर आम लोगों के मन में उठ रहे सवालों का ज़िक्र किया तो मुझे लैफ़टिस्ट कहा जाने लगा, जिस दिन मैने तिरंगे और भारत माता की जय की पैरवी की तो मुझे संघी बना दिया गया, जिस दिन मैने युनिफ़ॉर्म सिविल कोड के पक्ष में बात की तो मुझे मुस्लिम विरोधी बता दिया गया। किसी खालिद की बात नहीं करूंगा क्योंकि बवाल मच सकता है और मुझे भी वो नाम दे दिया जाएगा जो मैं नहीं हूं। मुझे नहीं मालूम कि इसे पढ़ने के बाद मुझे क्या नाम दिया जाएगा, पर मैं सिर्फ़ मैं हूं वो नहीं जो वो मुझे नाम देना चाहेंगे।
अब किसी ने तख्ती उठा ये संदेश दिया कि जो शहीद हुआ था, उसे युद्ध ने मारा था पाकिस्तान ने नहीं। हां, सही है कि युद्ध बुरी चीज़ है, पर जो युद्ध हुआ उसके लिए कोई तो ज़िम्मेदार रहा होगा। कह तो ये भी सकते हैं कि कोई माचिस की तिल्ली किसी के घर का चूल्हा जलाती है और किसी का घर भी राख कर देती है। कसूरवार न माचिस को मानिए या न आग लगाने वाले को, बस आग को मान लीजिए और हो सके तो तो उसे जेल में भी डाल दीजिए। इसी बीच एक शाहीद के पिता जी का ब्यान आया ’मेरे बेटे को युद्ध ने नहीं, पाकिस्तान ने मारा।’ खैर मान लेता हूं दोनों ने अपनी अपनी बात कही और अपने अपने तरीके से कही। अपनी बात कहने के लिए दोनों आज़ाद है जैसे मैं अपनी बात लिखने के लिए। परन्तु ये भी सत्य कि युद्ध स्वयंभू वस्तु नहीं है? जैसे ब्यान देना हर किसी अधिकार है, उसकी प्रतिक्रिया आना भी सहज बात है। इसलिए किसी को भी तिलमिलाना नहीं चाहिए - न लैफ़्ट को न राइट को। ब्यान देने वाले ब्यान दे हट गए। उनके ब्यान का क्या मतलब रहा होगा, वही बता सकते हैं परन्तु लैफ़्ट राइट तो चल ही रही है और बड़े ज़ोर शोर से चल रही है।
अपने विचारों को अभिवयक्त करना संविधान में प्रदत एक अधिकार है, मगर वही संविधान इस आज़ादी को संयमित भी करता है। आप बोलिए, ऊंची आवाज़ में बोलिए मगर आवाज़ इतनी ऊंची भी नहीं होनी चाहिए कि किसी पड़ोसी की नींद ही हराम हो जाए। आप बोलिए, गुस्सा कीजिए, अपनी नाराज़गी ज़ाहिर कीजिए, ज़ोर से बोलिए, मगर किसी को गाली देने का अधिकार न संविधान देता है न हमारे संस्कार। जो न संविधान की माने न संस्कार की तो आप तय कीजिए की वो किसकी मानता होगा। ज़रा सोचिए आप घर में कैसी भाषा का इस्तेमाल करते हैं। क्या मा या बहन की गाली देते हैं? नहीं देते तो घर के बाहर ये कायदे क्यों बदल जाते हैं। सरकारों से सवाल कीजिए, उनसे ज़वाब मांगिए। बहस कीजिए, मगर ज़ुबान संयमित रखिए। नारे लगाइए, विरोध कीजिए, मगर याद रखिए किसी मुल्क के ज़िंदाबाद से हमें तकलीफ़ नहीं मगर, ’भारत मुर्दाबाद’ बर्दाश्त से परे है। मीडिया का प्रश्नवादी होना ज़रूरी है। घटना भी दिखाइए, दुर्घटनाएं भी ज़रूर दिखाइए। अपने चैनल का पर्दा इतना भी अंधेरा न कीजिए कि लोगों को अंधेरे की ही आदत पड़ जाए। देश का रोशन चेहरा भी दिखाइए। बातें कीजिए, मगर बातें मत बनाइए। सहिष्णुता के मामले में इस देश का इतिहास अपने आप में प्रमाण है। हां, कमियां हर घर में होती है। उन कमियों की वजह से घर तोड़ लिया जाए तो कमियां हमारी हैं। याद रखिए - कौन सी बात कहां कैसे कहनी है, ये सलीका हो तो हर बात सुनी जाती है।

Saturday, 8 October 2016

हिमाचल विश्वविद्यालय हिंसा

इधर हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय प्राशासन राष्ट्रीय आंकलन एवं प्रत्यायन दल (नैक) से प्रदेश के इस उच्च शिक्षण संस्थान के लिए ए ग्रेड की आस लगाए बैठे हैं, उधर परिसर में खूनी संघर्ष चल रहा है। किसी के ज़िंदाबाद और किसी के मुर्दाबाद के नारों से गूंजते व खून से सने इस माहौल को देख कर वे हैरान ज़रूर हो रहे होंगे कि भोलेपन के लिए मशहूर इस शांतिप्रिय प्रदेश के उच्च शिक्षण संस्थान में ये कैसा घृणित व शर्मसार कर देमे वाला खूनी खेल चल रहा है। ऐसे में विश्विद्यालय की ग्रेडिंग करते समय नैक पशोपेश में ज़रूर पड जाएगा। अगर ए ग्रेड मिल भी गया तो उसके क्या मायने? विद्या के जिस परिसर में ज्ञान की महक का अहसास होना चाहिए, वहां अगर भय व असुरक्षा का वातावरण हो तो ग्रेड ए मिले या ज़ैड। जहां इल्म के चिराग जलने चाहिए, वहा अगर हिंसा का तांडव देखने को मिले, तो उस विश्वविद्यालय में अध्ययन की चाह रखने वालों पर क्या असर होगा। जिन हाथों में देश का नक्शा बनाने की कलम होनी चाहिए, उन हाथों में अगर पत्थर या तलवार आ जाए तो उस देश का नक्शा क्या होगा? जिन होस्टलों की अल्मारियां और मेज पुस्तकों से भरी होनी चाहिए, वहां अगर हॉकी, सरिये, ईंट और पत्थर का ज़खीरा मिले, तो अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं कि शिक्षा की क्या दशा है और यह किस दिशा में अग्रसर है। ये प्रदेश विश्वविद्यालय की कैसी तसवीर देश के सामने प्रस्तुत हो रही है।
नारेबाज़ी, पत्थरबाज़ी, लात-घघूंसे तो हिमाचल विश्वविद्यालय के लिए एक आम बात है। अगर इस विश्वविद्यालय के इतिहास में झांका जाए, तो हिंसक घटनाओं का काला इतिहास सामने आता है। आजकल विश्वविद्यालय में जो चल रहा है, उससे इसके इतिहास के लहू से सने पन्ने फ़िर सामने आ जाते हैं, जिन्हें हर हिमाचली बुद्धिजीवि भूलना चाहता है। 1979 में सुरेश सूद, 80 के दशक में नासिर खान व भारत भूषण और 1994 में कुलदीप ढढवालिया इस छत्र हिंसा में मौत का ग्रास बन गए थे। जिस भी छात्र संगठन को जब सुविधाजनक लगता है, वे प्रयेक कक्षा में जाकर कक्षाओं का बहिष्कार करवा देते हैं। कोई कक्षा न छोड़ने की हिमाकत नहीं कर सकता। अगर करता है, तो बहुत बड़ा जोखिम मोल लेता है। जो वाकई पढ़ना चाहते हैं वो जाएं तो कहां जाएं?
दरसल हिमाचल विश्वविद्यालय में हिंसा दोनों स्थितियों में होती है - जब प्रत्यक्ष चुनाव हो, तब भी और जब अप्रत्यक्ष हो, तब भी। पहली स्थिति में चुनाव के लिए हिंसा होती है, दूसरी स्थिति में चुनाव के कारण। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि विश्वविद्यालय में सक्रीय छात्र संगठन बड़े राजनैतिक दलों की शाखाएं हैं। ये दल विश्वविद्याल का इस्तमाल अपनी राजनैतिक हवा बनाने के लिए करते हैं। छात्र संगठनों के हाथ में जो पत्थर होता है, वो इनका अपना नहीं होता। इनके तो सिर्फ़ हाथ होते हैं और पत्थर राजनैतिक आकाओं द्वारा इन हाथों में थमाए जाते हैं। हिंसा का हल इस बात में है कि विश्वविद्यालय में राजनैतिक दल अपना हस्तक्षेप करना बंद कर दें। दलगत संगठनों पर रोक लगा कर भी प्रत्यक्ष चुनाव करवाए जा सकते हैं। कोई भी अपने स्तर पर चुनव लड़ सकता है। ऐसे में हिंसा होने के आसार भी बहुत कम हो जाएंगे और हर एक इच्छुक को प्रतिनिधित्व करने का अधिकार भी मिल जाएगा। मैरिट आधार पर प्रतिनिधी का चुनाव चुनावी हिंसा को तो रोक सकता है, परन्तु छात्र संगठनों के टकराव से उत्पन्न होने वाली हिंसा को नहीं। दूसरे यह आवशयक नहीं कि जो मैरिटोरियस है, वह एक अच्छा प्रतिनिधित्व भी दे पायेगा।
मां-बाप जब अपने बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए विश्वविद्यालय भेजते है, तो उनकी आंखों में सपने होते हैं - मेरा बेटा ये करेगा, वो करेगा। उन्हें एक उम्मीद होती है कि उनका लाल उनके सपनों को साकर करेगा। परन्तु विश्वविद्यालय परिसर के आस-पास बिखरे कांच के टुकड़े कई मा- बाप के बिखरे सपनों की गवाही देते हैं। उन्हें ये पता भी नहीं चल पाता कब उनका लाल शीशे और पत्थर के खेल में उलझ गया। अपने बेटे को शीशे और पत्थर के खेल का शिकार होते देख उनके सपने दम तोड़ने लगते हैं। जब वे इस तरह का भयावह माहौल देखत है तो वे मन मसोस कर रह जाते हैं। जब तक इन लालों को अहसास होगा, तो शायद बहुत देर हो चुकी होगी। फ़िर वे ज़रूर कहेंगे- काश मेरे हाथ में पत्थर की जगह कलम होती, किताब होती, कागज़ होता, तो मैं हिंदोस्तान का एक नक्शा बनाता।

Saturday, 1 October 2016

शिक्षण संस्थानों में हिंसा और गुरु-शिष्य के बीच बढती खाई

दिल्ली के सुलतानपुरी इलाके के एक सरकारी स्कूल में अध्यापक का अपने ही शिष्य द्वारा कत्ल करना गुरु-शिष्य के बीच बिगड़ते रिश्ते की पराकाष्ठा है। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि शिष्य गुरु का कत्ल तक करने पर उतर आया हो। हमारे प्रदेश में भी इस तरह की घटनाएं होती आयी हैं। 14 दिसम्बर 1998 में अरसू के एक सरकारी स्कूल के नवी कक्षा के एक छात्र ने प्रधानाचार्य पर सरिये से वार किया जिसके कारण उनकी मौत हो गयी। अगस्त 2014 में संजौली कॉलेज में छात्रों ने प्रधानाचार्य व अन्य शिख्शकों के साथ मार-पीट की थी। चंद रोज़ पहले गंगथ में सरकारी स्कूल के एक छात्र ने सुबह-सवेरे स्कूल ग्राउंड में प्रधानाचार्य का गला पकड़ लिया था। उनकी गलती ये थी कि उन्होंने उस छात्र को एक विद्यार्थि की तरह अनुशासित होने की हिदायत दी थी। इसके अलावा दिसंबर 2014 में झारखंड के एक स्कूल के सातवी कक्षा के तीन छात्रों ने अपने अध्यापक को इसलिए मार डाला क्योंकि उक्त अध्यापक ने उन्हें धुम्रपान न करने की सलाह दी थी। फ़रवरी 2012 में चिन्नई के एक स्कूल में नवी कक्षा के छात्र ने चाकू से अपने अध्यापक की जान ले ली। अध्यापकों से थप्पड़बाज़ी, गालीगलौज, बदसलूकी जैसी घटनाएं तो अब आम होती जा रहीं हैं।
जहां हमारे देश का इतिहास गुरु-शिष्य की आदर्श परंपरा के उदाहरणों से भरा पड़ा है, वहीं आज गुरु-शिष्य के बीच बढ़ती खाई एक ज्वलंत समस्या बन चुकी है। जिस देश में शिष्य अपने गुरु को देवतुल्य मानता आया है, वहीं आज इस रिश्ते में इतनी तलखी और हिकारत आ गयी है कि नौबत कत्ल तक पहुंच जाती है। विद्यालय में मुल्क के भविष्य को सींचा जाता है और भाग्य की रेखाएं खींची जाती है। इस मुकदस जगह पर इल्म के चिराग जला कर गुरु अपने शिष्य के अज्ञान के अंधेरे को दूर करने का प्रयास करता है और उसे अनुशासन, संस्कार और शिष्टाचार का सबक पढ़ाता है। परन्तु जो कुछ घटित हो रहा है, उससे साफ़ ज़ाहिर है कि धीरे-धीरे शिक्षण संस्थान अनुशासनहीनता, बदज़ुबानी, मारपीट, और हिंसा का केंद्र बनते जा रहे हैं।
आज गुरु-शिष्य के संबंधों में वो आत्मीयता नहीं रही। अगर अपने शिष्य को सही राह दिखाना, पथभ्रष्ट होने से रोकना, गलती पर टोकना, उसे अनुशासित रहने का सबक सिखाना गुरु के लिए अब गुनाह हो गया है, तो आखिर इन शिक्षा के मंदिरों का औचित्य क्या है? यदि शिक्षण संस्थानों में ऐसा होता रहा, तो ऐसे असुरक्षित वातावरण में गुरु कैसे अपने कर्तब्य का निर्वाह कर पाएगा? क्या संत कबीर जी की ये पंक्तिया सिर्फ़ किताबी छलावा है?
गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढि़ गढि़ काढ़ै खोट
अन्तर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट
गुरु और शिष्य की बीच की तना-तनी का एक कारण यह है कि दोनों कक्षा में एक दूसरे से मिलते तो हैं, परन्तु उनमें संवाद नहीं होता। गुरु की बात शिष्य नहीं समझ पाता और गुरु शिष्य तक नहीं पहुंच पाता। पढ़ाई किताबों से नहीं, बल्कि दिल से होती है। यदि अध्यापक शिष्य को नहीं समझ पा रहा है, तो बेहतर है अध्यापक शिष्य को समझे। अध्यापक और शिष्य का रिश्ता वर्चस्व स्थापित करने का नहीं, बल्कि समझ का एक ज़हनी रिश्ता है।
गुरु-शिष्य के बीच बढ़्ती दूरियों के लिए अभिभावक भी जिम्मेदार हैं। अभिभावक समझते हैं कि शिक्षक महज़ एक कर्मचारी हैं जिसे सरकार मोटी तनख्वाह दे रही है या उसे मोटी रकम फीस के रूप में अदा की जा रही है।वे भूल गए हैं कि गुरु-शिष्य का रिश्ता ग्राहक और दुकानदार का पेशा नहीं है। शिक्षण ऐसा कार्य है, जिसमें शिष्य में ज्ञान के प्रति जुनून व समर्पण की भावना होनी चाहिए और गुरु में अपने ध्येय के प्रति निष्ठा। बच्चों के मन में शिक्षक के प्रति आदर-भाव भरने की बात तो दूर, अभिभावक उनकी शिकायत करने या उनके विरुद्ध मुकद्दमा दायर करने के लिए आतुर रहते हैं। ऐसी स्थिति में बच्चों में गुरु के लिए सम्मान की भावना कैसे विकसित होगी? हालांकि विद्यालयों में एस एम सी गुरु-शिष्य-वालदेन के रिश्तों को सुदृड़ करने में अहम भूमिका निभा सकती है। परन्तु ज़्यादातर एस एम सी के सदस्य या तो निष्क्रीय हैं या फ़िर शैक्षणिक कार्यों को पीछे रख कर राजनीति में ज़्यादा रूची लेते हैं।
घर बच्चे की पहली पाठशाला होती है और मा-बाप पहले अध्यापक। बच्चों के मानस पटल पर घर के माहौल और वहां मिल रही तरबीयत का गहरा असर होता है। जिस अत्यधिक खुले वातावरण में आज बच्चे पल रहे हैं, उसने उनका भला कम और नुक्सान ज़्यादा किया है। अति सर्वत्र वर्जयेत अर्थात किसी भी चीज़ का आवश्यकता से अधिक होना नुकसानदेह होता है। कुछ माता-पिता ’बैस्ट पापा’ या ’बैस्ट मॉम’ कहलाने के चक्कर में अपने बच्चॊ की हर बात या मांग पर ’यैस’ कहने की होड़ में शामिल रहते हैं। इस होड़ में न माता-पिता, न ही बच्चे ये समझ पाते हैं कि ’नो’ शब्द की अहमियत कितनी है। ’यैस’ को सुनते-सुनते बच्चे को ’नो’ सुनना अखरने लगता है। अनुशासन में बंधना उसे बोझ लगने लगता है। ’दरवाज़ा खुला है’ वाली निति पर चलते-चलते पता भी नहीं चलता कि बच्चा कब हाथ से निकल गया और राह से भटक गया। वास्तव में आज उचित समय पर कहा गया ’नो’ कल बच्चे के भविष्य के लिए ’यैस’ साबित होता है। मा बाप को याद रखना चाहिए कि एक चिंगारी को बुझाने के लिए चुल्लु भर पानी भी काफ़ी होता है, मगर जब वह ज्वाला बन जाए, तो दमकल विभाग का टनों पानी भी कुछ नहीं कर पाता। उठते ज़ख्म को वक्त पर दवा न मिले तो वह नासूर बन जाता है। बच्चे की बेहतर परवरिश के लिए डांट व दुलार, फ़टकार व तारीफ़, थपेड़े व पुचकार की ज़रूरत होती है, ताकि उसका विकास एकतरफ़ा न हो। शायर राहत इंदौरी ने सही फ़रमाया है:
नई हवाओं की सोहबत बिगाड़ देती है, कबूतरों को खुली छत बिगाड़ देती है.
जो जुर्म करते हैं इतने बुरे नही होते सज़ा ना देकर अदालत बिगाड़ देती है

Friday, 23 September 2016

वसुधैव कुटुम्बकम

          इंसान क्या था क्या हो गया, कोई हिंदु, कोई मुसलमान हो गया - जब मनुष्य का जन्म होता है, तो वह ‘अल्ला हू अकबर‘ या ‘हर हर महादेव‘ का सिंहनाद करते हुए इस दुनिया में अवतरित नहीं होता। किसी पर भी ये ठप्पा नहीं लगा होता कि अमूक व्यक्ति हिंदू, मुसलमान, सिक्ख या ईसाई होगा। कोई इस तरह की चिप्पी भी नहीं लगी होती कि ये गोरा, ये काला, ये सांवला, ये निम्न जात का, ये ऊंची जात का। ख़ुदा ने तो इंसान पैदा किया है और वो भी एकदम बराबर, परन्तु वो खुद ही बंट गया - कोई बन गया हिंदू, कोई सिक्ख, कोई मुसलमान, कोई ईसाई, कोई ढीमका, कोई फ़्लां। हम इस संसार में उसके बंदे के रूप में आते हैं। मानव की एक ही जात है - इंसानियत और एक ही मज़हब है - मोहब्बत।
          गांधी जी ने कहा है - आंख के बदले आंख एक दिन विश्व को अंधा बना देगा। साबरमती के इस संत ने दया, सत्य और अहिंसा के रास्ते पर चलते हुए देश को बिना खड़ग और ढाल आज़ादी दिलाने का बीड़ा उठाया था और पूरे विश्व को मानवता का संदेश दिया था। भले ही ब्रिटिश प्रधान मंत्री, विन्सटन चर्चिल, ने गांधी जी को कटाक्ष करते हुए ’नंगा फ़कीर’ कहा था, परन्तु इसी नंगे फ़कीर को आज सारा विश्व सहस्राब्दी पुरूष और महात्मा के रूप में शीष नवाता हैं। ऐसा नहीं था कि वे कुर्ता नहीं खरीद सकते थे, मगर कुर्ता न पहन कर उन्होंने मानव को परस्पर दया, संवेदना, प्रेम और सहानुभूति का संदेश दिया था। उन्होंने मानव समाज को अहिंसा को अपनी जीवनशैली बनाने के लिए प्रेरित किया।
          आज के वैमनस्व, नफ़रत, हिंसा और कत्लेआम के दौर में उनका संदेश और भी अहम हो जाता है क्योंकि धर्म, जाति, रंग के आधार पर इतना खून बहा है कि भविष्य हमें कभी माफ़ नहीं करेगा। कहीं कोई लहु के चंद कतरों के लिए तरसता है. तो कहीं वही लहू ख़ुदा के नाम पर सड़कों पर बह रह होता है। कहा जा सकता है:
नफ़रतों का असर देखो जानवरों का बंटवारा हो गया,
गाय हिन्दू हो गई और बकरा मुसलमान हो गया 
                   
          ऐसा नहीं होता कि सूर्य की किरणें किसी पर मधम और किसी पर तेज़ पड़ती हैं और वर्षा की बूंदें किसी पर बरसती हैं और किसी को अछूता रख देती है। चांद का कोई मज़हब नहीं, ईद भी उसकी मनाई जाती है और करवा चौथ भी। रिलायंस हो या वोडाफ़ोन, कोई ऐसा नेटवर्क नहीं जो गोरे रंग वालों को बढ़िया और काले रंग वालों को घटिया सिगनल देते हैं या हिंदूओं के लिए बढ़िया चलते हैं और मुसलमानों के लिए रुक जाते हैं। काले का ख़ून भी लाल, गोरे का खून भी लाल; हिंदू का खून भी लाल, मुसलमान, सिक्ख, ईसाई का खून भी लाल। न हमें ख़ुदा ने बांटा, न हमें प्रकृति ने बांटा, फ़िर इंसान ने इंसान क्यों बांट रखा है? संत कबीर कहते हैं:
अव्वल अल्लाह नूर उपाया, कुदरत दे सब बन्दे,
एक नूर ते सब जग उपज्या कौन भले कौ मंदे
          उर्दू शायर इकबाल ने बहुत ख़ूब कहा है - मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना सद्भाव सभ्यताओं को जोड़ता है, राष्ट्र को बनाता है। जाति, वर्ण, रंग, धर्म, कोई भी हो, वो एक दूसरे से न निम्न हैं, न एक दूसरे से ऊपर। धर्मवाद, रंगवाद, जातिवाद ऐसी बिमारियां है जो केवल मानव को बांटती हैं और सभ्यताओं को विनाश की ओर ले जाती हैं। किसी को ये हक नहीं कि वह जाति, धर्म और रंग के आधार पर किसी का हक छीनें, किसी को अपमानित करे और किसी का कत्ल करे। ये सभी धर्मों के उसुलों के विरुद्ध है। न धर्म टकराते हैं, न जाति, न रंग। टकराती तो वहशत है, टकराती तो संगदिली है। यदि मौहब्ब्त का उद्घोष करेंगे, तो संसार मोहब्बत की रोशनी से जगमगा उठेगा। यदि घृणा का उद्घोष करोगे, तो सारा संसार नफ़रत के अंधेरे में डूब जाएगा। हम इस दुनिया को प्यार-मौहब्बत से एक अचछी जगह बनाने आए हैं। वहशत और दहशत फ़ैलाने वालों का कोई धर्म नही होता। वे न कुरान के हैं, गीता के, गुरुग्रन्थ साहिब के, बाइबल के। वे सिर्फ़ इंसानियत के दुश्मन होते है।
          प्रत्येक मनुष्य को अपने सिद्धांतो पर चलने का अधिकार है, परन्तु समस्या तब पैदा होती है जब हम दूसरों के विश्वास व सिद्धांतों को गलत साबित करने पर तुल जाते हैं। धर्मांध हो कर हम हर दूसरों के विचारों, विश्वास को धर्म के चश्में से देखना आरंभ कर देते है। धर्म के मद में अंधे व्यक्ति को सिर्फ़ अपना ही धर्म उत्तम लगता है और दूसरों का धर्म निम्न।
          हम एक ही जड़ से उत्पन्न हुए पौधे हैं। ऐसा कैसे हो सकता है कि आप जड़ से मोहब्बत करें और पेड़ से घृणा? इंद्रधनुष इसलिए सुंदर और दिलकश लगता है क्योंकि उसमें सात रंगों का अनूठा संगम है। हमारा प्रदेश, हमारा देश, हमारा संसार तभी सुंदर लगेगा अगर यहां विभिन्न, जाति, रंग और धर्म के लोग भ्रातृभाव से रहें। इस भाव को मन से निकाल दें कि दाढ़ी वाले दहशतगर्द और चॊटी वाले काफ़िर हैं।
          तो आओ! 'वसुधैव कुटुम्बकम’ और 'सर्वे भवन्तु सुखिनः’ को अपने जीवन का सिद्धांत बना कर एक कल्याणकारी संसार बनाने का प्रयास करें और मार्टिन लूथर किंग के इन शब्दों को याद रखें - हमें बंधुओं की तरह रहना होगा या फ़िर धूर्तों की तरह नष्ट होना होगा।"
मैं  अमन पसंद हूँ, मेरे शहर में दंगा रहने दो
लाल और हरे में मत बांटो, मेरी छत पर तिरंगा रहने दो


Tuesday, 13 September 2016

बहुभाषिये बनो


    'निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल' - जब जब भी हिंदी दिवस आता है या हिंदी भाषा का ज़िक्र होता है, तो इस भाषा के चिंतक भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की प्रसिद्ध कविता मातृभाषा के प्रति' से ली गयी इस पंक्ति का जिक्र अवश्य करते हैं। ऐसा करना उचित भी है और स्वभाविक भी क्योंकि ये वो भाषा है जिस में हमने सबसे पहले अपने ज़ज़बातों व एहसासों को शब्दों में अभिव्यक्त करना आरंभ किया। चाहे हमारे संविधान में बहुत सी भाषाओं को राष्ट्रीय मान्यता दी गयी है, परन्तु हिंदी को राजभाषा का दर्ज़ा दिया गया है। टूटी-फ़ूटी ही सही, हिंदी देश के लगभग हर प्रांत और खंड में बोली या समझी जाती है। इस तरह यह देश को एक सूत्र में भी बांधती है।
    परन्तु, हिंदी भाषा को तरज़ीह देने के मायने ये भी नहीं है कि अन्य भाषाओं को हीन दृष्टि से देखा जाए। मुझे भाषा के उन पंडितों से सख्त गिला है, जो हिंदी को हिंदुओं से, उर्दू को मुसलमानों से, अंग्रेज़ी को गोरों से, पंजाबी को पगड़ी से जोड़ने की कोशिश करते हैं। कई हिंदी के हिमायती तो कह-कह कर नहीं थकते कि अंग्रेज़ी भाषा से गुलामी की बू आती है, लेकिन ख़ुद 'मे आई कम इन', 'बाय-बाय', और 'थैंक यू' जैसे अंग्रेज़ी के शब्दों का प्रयोग करने में अपनी बड़ाई मानते हैं। वास्तव में भाषाएं तो एक दूसरे की बहनें होती हैं। वे कभी नहीं टकराती। टकराती तो भाषा के प्रति हमरी मानसिकता है। अगर हिंदी हमारी मां है, तो अन्य भाषाएं हमारी मौसियां हैं। अगर मां के पास हमें अभिव्यक्ति का रास्ता नहीं मिलता, तो मौसियों की शरण में हमें रास्ता मिलता है।
    अगर हम अपनी-अपनी भाषाओं के दायरे खींच ले, तो न तो भाषाओं का आदान-प्रदान होगा, न उनका विकास होगा और न ही हम एक दूसरे की संस्कृति से पूरी तरह वाकिफ़ हो पाएंगे। अगर भाषाएं एक दूसरे से न मिलती, तो श्रीमद भगवद गीता को केवल हिंदु पढ़ पाते, कुरान मुसलमान ही पढ़ते, आदिग्रन्थ केवल सिक्ख जानता और बाइबल केवल ईसाईयों तक सीमित रहती, परन्तु इन पुस्तकों का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद उपलब्ध होने से विश्व के लोग इन्हें पढ़ पाते हैं।
    देश की आज़ादी में भी कई भाषाओं का योगदान रहा है। राष्ट्रगीत ’वंदे मातरम’ और राष्ट्रगान ’जन गण मन’ हमें बांग्ला ने दिए और ’सारे जहां से अच्छा...’ इकबाल की उर्दू भाषा में लिखी गई देश प्रेम की ग़ज़ल है। अगर ’दिल्ली चलो’ नारा हिंदी में दिया गया, तो क्रांति का प्रतीक ’इंक़िलाब ज़िन्दाबाद’ का नारा उर्दू ज़बान का है। टैगोर की ’गीतांजली’ को ब्यापक सम्मान अंग्रेज़ी में अनुवादित होने के उपरांत मिला। चाहे राम प्रसाद बिस्मल ने कहा ’लगा रहे प्रेम हिन्दी में, पढूँ हिन्दी लिखुँ हिन्दी’, फ़िर भी उनका उर्दू से बहुत लगाव था। उन्होंने बिस्मल को अपना तख़ल्लुस बनाया और ’सरफ़रोशी की तमन्न्ना आज हमारे दिल में है...’ जैसे उर्दू के तराने लिखे। मुंशी प्रेमचंद की कहानियों और दुष्यंत कुमार की गज़लों में हिंदी व उर्दू जिस तरह से हमामेज़ हुई हैं, वह साहित्य को एक ख़ूबसूरत आयाम देता है। जहां हिंदी, उर्दू और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं ने देश की आज़ादी में अहम भूमिका निभाई, वहीं आधुनिक भारत के जनक राजाराम मोहन राय ने अंग्रेज़ी का इस्तमाल भारत पुनर्जागरण के लिए किया। उन्होंने इस भाषा को अंग्रेज़ों और भारतीयों के बीच सेतु स्थापित करने के लिए भी किया। ये भी नहीं भूलना चाहिए कि पंडित नेहरू. आर के नारायनन, राजा राव, किरन देसाई, अरुनधति रॉय जैसे भारतीय लेखकों ने अंग्रेज़ी भाषा का इस्तमाल करके ऐसी साहित्यिक रचनाएं  लिखी जिन से विश्व में देश का नाम रोशन हुआ है।
      हिंदी भाषा के कई ख़ैरख्वाह अक्सर हो-हल्ला मचाते हैं कि हिंदी खतरे में है, जबकि वास्तव में यह केवल बेवजह का डर है। आज हिंदी चीनी भाषा मैंडरिन के बाद विश्व में इस्तमाल की जाने वाली सबसे बड़ी ज़बान है। वास्तव में हिंदी भाषा में अपने को बनाए रखने की सिफ़्त मौज़ूद है। आज यह गुगल से होते हुई कई देशों में बोली, लिखी व पढ़ी जाते है।
    किसी भी भाषा के विस्तार और विकास के लिए ज़रूरी है, यह दूसरी भाषाओं के प्रति उदार रहे। माना जा सकता है कि अंग्रेज़ी इस नज़रिए से अव्वल आती है क्योंकि इस में दूसरी भाषा के अल्फ़ाज़ को अपने में समाहित करने की बहुत क्षमता है। जैसे हिंदी के कई अल्फ़ाज़ ऐसे हैं जिन के मुकाबिल दूसरी ज़बान में अल्फ़ाज नहीं मिलते, ठीक वैसे ही दूसरी ज़बान के कई अल्फ़ाज़ ऐसे हैं जिन के मुकाबिल हिंदी में अल्फ़ाज नहीं। एक-दूसरे की ज़बान के अल्फ़ाज़ को हमामेज़ करने ही सलाहियत ही ज़बान को विस्तार प्रदान करती है।
    हिंदी को मज़बूत और विकसित होने के लिए इसे आम लोगों के और निकट लाना होगा। भले ही कुछ साहित्य के पारखियों का मानना है कि कलिष्ट शब्दों के इस्तमाल से भाषा मज़बूत होती है और इसकी शान बढ़ती है, परन्तु ऐसा असलियत में नहीं होता। कठिन व कलिष्ट भाषा का इस्तमाल साहित्यिक दृष्टि से तो उचित हो भी सकता है, परन्तु इस तरह यह जनमानस की भाषा नहीं बन सकती। जो भाषा जनमानस की नहीं बन सकती, वह कभी विकसित नहीं हो सकती।
    भाषा किसी की बांदी नहीं होती। इसे किसी खूंटे से नहीं बांधा जाना चाहिए अन्यथा यह ऐसे पिंजरे के पंछी की तरह हो जाती है जिसे ज़ीने के लिए दाना तो मिलता है, पर उसकी ऊड़ान कुंद रह जाती है। हिंदी भाषा की सादगी, उर्दू की लज़्ज़त, और अंग्रेज़ी की ख़नक मिल जाए तो भाषा का ज़ायका वैसा होगा जैसा अपने ख़ेत की राजमाह की दाल का जिसमें टमाटर का तड़का लगा हो।