Sunday, 7 April 2019

रोटी

सड़क के एक खुले मोड़ पर
वह धोता मैला
चमकाता
मारता बार बार पानी
घिसता
गाड़ी को चमकाता
नई कर दूंगा साहब
कहता
शायद कुछ बख्शीश वो चाहता
बाकि सब जाता है
मालिक की जेब में
जो दे देता है उसे
दो वक्त की रोटी
बच्चों के उतरे कपड़े
छोटा सा कमरा
मिल जाती उसे
चंद सांसे
जीने के लिए
मिल जाती है उसको रोटी
स्कूल छोड़ आया
जौनपुर से भाग आया
और भी है दो बहिने
बाप की मज़दूरी से
नहीं हो पाती है पूरी रोटी
स्कूल भला खाक वो जाता
किताबों से पहले चाहिए रोटी
हिमाचल अच्छा है बाबू
मुस्कुराता
मिल जाती है यहां रोटी
लो चमक गई बाबू गाड़ी
बिल्कुल नई लगे है
खुश हो कर कहता
अगकी गाड़ी का नंबर आता
फ़िर धोता मैला
चमकाता
मारता बार बार पानी
घिसता
गाड़ी को चमकाता
दिल मेरा करुणा से भर आता
दो सौ का नोट निकाल
मालिक को देता
और पचास का नोट
उसको थमा देता
वह मुस्कुराता
बाय बाय टाटा करता
वह खुश है
नहीं जा पाता वो स्कूल
तो क्या
मिल जाती है उसको
रोटी
मिल जाता है
कपड़ा और मकान

मैं सोचता
इस देश में
मंदिर है मस्ज़िद है
हिंदू है मुसलमान है
राम है रहीम है
गाए है बकरा है
ईद है दिवाली है
हर हर महादेव है
अल्ला हू अकबर है
कश्मीर है
धारा 370 है
भाषण हैं
जुमले हैं
कागज़ों में सपने हैं
पर सपनों से
जुमलों से
कहां पेट पल पल पाते हैं
सरकारों के एजैंडे में क्या क्या नहीं
पर नहीं हैं उसके लिए रोटी
मेरे एजैंडे में भी है
उसके लिए थोड़ी सी बख्शीश
एक झूटी तसल्ली
एक ढोंग
जिससे मैं खुद को
इंसान कहलवाना चाहता हूं

मैं सीधा लिखता हूं

तल्ख हो कर वो पूछते हैं मुझ से
क्यों लिखते हो तुम सीधा
तुम भी लिखो कुछ टेढ़ा
जैसा और भी लिखते हैं
मुड़ा हुआ कुछ इस तरफ़
झुका हुआ कुछ उस तरफ़

तल्खी से मैं भी कह देता हूं उन से
मैं सीधा मेरी कलम सीधी
आदमी टेढ़े से हो गया सीधा
क्यों लिखूं मैं फ़िर टेढ़ा
मुड़ा हुआ कुछ इस तरफ़
झुका हुआ कुछ उस तरफ़

गुरेज़ क्यों मैं करूं सीधा लिखने से
फ़िर फ़िर कर लिखता हूं
पर मिली है तासीर कुछ ऐसी
कि बन पड़ता है सब सीधा
न मुड़ा हुआ कुछ इस तरफ़
न झुका हुआ कुछ उस तरफ़

औरों से नहीं, कहता हूं खुद ही से
लिखो ऐसा कि तीर सा लगे
करे कोई आह या कोई वाह
कि हां क्या खूब लिखा है
न मुड़ा हुआ कुछ इस तरफ़
न झुका हुआ कुछ उस तरफ़

घट जाता है दाम कलम का बिकने से
अड़ जाए जो न बिकने पर
तो बढ़ जाता है दाम इसका
बांदी नहीं ये कलम किसी की
न मुड़ेगी कभी इस तरफ़
न झुकेगी कभी उस तरफ़

न साहिब से, न लेना कुछ मुसाहिब से
बिके हुए हैं निज़ाम
खरीदे हुए हैं मसनद
कलम है ये ‘बाली‘ की
न खरीद पाएगा कोई इस तरफ़
न बिकेगी कभी ये उस तरफ़


घर

कोई दीवार चिनता है
कोई छत बींदता है
रेत, बजरी, लक्कड़ी,
पत्थर, मिल जाए
तो मकान बनता है
पर घर नहीं बनता है

स्नेह की हो नींव
प्यार की ईंटें
संवेदनाओं की गोंद
रिश्ते का हो ताना-बाना
तो घर बनता है

मा की हो लोरियां
नाना-नानी की कहानियां
दादी का दुलार
दादा जी से हो ठिठोली
तो घर बनता है

पिता जी की डांट-फटकार
मां का आंचल
नौक झौंक में अपनापन
बच्चॊ के साथ पलते हो संस्कार
तो घर बनता है

नहीं सिकुडति हो भौंएं मेहमान आने पर
बूढ़े मा बाप की हो कदर
बुज़ुर्गों का आशीर्वाद
बातों के साथ बनता हो चरित्र
तो घर बनता है

ठनती हो सास-बहू की
पर फ़िर हो बनती
अटूट प्रेम का धागा
झगड़ते हो भाई-बहन
पर फिर मिलते हो गले
तो घर बनता है

उंची रंगदार इमारतें
दीवरों पर नक्ककाशी
नरम गलीचे, महंगे बर्तन,
गद्देदार कुर्सियां
इनसे मकान बनता है
मकान बनता है
पर घर नहीं बनता है
घर की चीज़ों से नहीं
घरवालों से घर बनता है   

पिता जी का लोइया

 किसी को कुछ चाहिए और किसी को कुछ चाहिए
आज भी पिता जी से सबको कुछ न कुछ चाहिए
छोटे के फटे जूते उसे रिबॉक के नए अभी चाहिए
फटी है बड़े की भी जींस उसे डेनिम की ही चाहिए
बिटिया हो गई बड़ी उसे अब नथ सोने की चाहिए
पुराना हुआ पत्नी का सूट उसे भी अब गर्म चाहिए
जाड़े में खुद पिता जी को भी लोइया नया चाहिए
एक पिता जी की कमाई से देखो क्या क्या चाहिए
खरीद लाए पिताजी वो सब कुछ जो जो था चाहिए
सब खुश हैं मिल गया जो सभी को जो था चाहिए
खुश हो ओढ़ लेते सब अब पिताजी का नया लोइया
दूर खड़े थे पिता जी जैसे उनके लिए नहीं है लोइया
हिसाब कर रहे थे कितने की आई चीजें और लोइया
कुछ एडवांस कुछ कर्ज से आए थे सब और लोइया
बेखबर बच्चे कहते खूब गर्म है पिता जी का लोइया
जैसे पिता जी का लोइया बन जाता है सबका लोइया
ऐसे ही पिता जी को भी बबना होता है सबका लोइया

ज़िंदगी का सफ़र


देख जलती चिता को ख्याल दिल में वही पुराना आया
मंज़िल ज़िंदगी की मौत के सिवा कुछ और है ही नहीं
सफर ज़िन्दगी का किसी भी रास्ते से तय कर लो तुम
पर रास्ता कोई मौत के सिवा कहीं और पहुंचता ही नहीं
लाख इंसा ने कर लिए जतन खोज लिए नए कई रास्ते
हासिल क्या जब रास्ता कोई और खुदा ने छोड़ा ही नहीं
अज़ल से सबको पता है आखिरी पड़ाव बस है एक यही
पर दिल है कि ज़िंदा रहने की जिद से मानता ही नहीं
मौत आनी है एक दिन और आ कर ही रहेगी एक दिन
कब कैसे कहां ये खुदा के सिवा किसी को पता ही नहीं
जन्म से मौत तक का है सफ़र बस इतनी सी है ज़िंदगी
जि गया जो ये सफ़र ज़िंदा है वो वर्ना मौत ही है ज़िंदगी

फ़ैसला

कहां इनाम का अब हुनर से फैसला होता है
बल्कि हुनर का अब इनाम से फैसला होता है
मक्कारों के फरेब से चलती है अब ये दुनिया
ज़हीनों के साथ अब धोखे से फैसला होता है
साज़िशों से ही जलते-बुझते हैं ज़िंदगी के दीए
कहां हवाओं की मर्ज़ी से अब फैसला होता है
मुफ़लिस ही रखते हैं इंसानी रिश्तों को ज़िंदा
पैसे वालों का तो बस पैसों से फैसला होता है
अपने ही अश्कों से मिलता है दिल को करार
कहां मुंसिफ़ से अब वफ़ा का फ़ैसला होता है
कौन सुनता है अकेले सच्च की आवाज़ को
काफिले के शोर से आयद हर फैसला होता है
परों से ही कहां सदा हो पाती है ऊंची परवाज़
जुर्रत से भी उड़ान का अहम फैसला होता है
न कर अब तू फिक्र और फैसले की 'बाली'
तेरी ज़िन्दगी का फैसला तेरे फैसले से होता है

वो कौन है?

जाने कौन
रोज़ चुपके से जगा जाता है
सूरज को
भर जाता है जग में उजाला
दे जाता है तपिश
और फ़िर दूर क्षितिज पर
तलहटी में उतर जाता है
डूब जात हैअंधेरे में
एक बार फिर सबकुछ
जाने कहाँ से उमड़ आते हैं
असंख्य टिमटिमाते तारे
शरारत करने को लालायित जैसे हों
नटखट बच्चे
नमूंदार होता है
पहरेदार सा फिर
अम्बर में चंचल चंदा
अनंत किरणों से अपनी जो
बुनता है सफ़ेद चादर
ओढ़नी की तरह जो बिछ जाती है
जल थल में
जाने कौन खींच जाता है
पानी को नभ में और
भर देता है बूंदों को
बादलों की सुराहियों में
उंडेल देता है इन्हें वापिस
धरती पर
उभर आता है शून्य में
सतरंगी इंद्रधनुष
चल निकलते है झरने
लिए मधुर संगीत
अलसाती धरती से
अंकुरित हो फ़ूट पड़्ते हैं
सुषुप्त बीज
और निकल आती हैं
नन्हीं कोंपलें
पीले सरसों से
लहलहा उठते हैं खेत
जंगल मैदान घाटियां पहाड़
सब हो जाते हैं हरे भरे
लद जाती तब धरा
रंग बिरंगे खिले फूलों से
महका जाता है तब कौन
फ़िज़ाओं को खुशबुओं से
परिंदों को दे जाता है कोई
हुनर घरोंदे बनाने का
पर और परों से उड़ना
सीखा जाता है कौन
जाने कौन दे जाता है
पंछियों को सुर
आखिर कौन छुप कर चलता है
ये सब चालें
खेलता है कौन हमसे
धूप-छाँव का ये खेल
आखिर कौन हम से करता है
ये अठखेलियां

Thursday, 18 October 2018

’मी टू’ को पुरुष भी समर्थन दे


     जब सत्ता में बड़े औधे पर बैठा कोई मंत्री, मीडिया जगत का कोई बड़ा पत्रकार, बॉलिवुड जगत का कोई निदेशक या मशहूर कलाकार दुनिया में ये कहते फ़िरे कि मानव विकास के लिये महिला सशक्तिकरण आवश्यक है और उधर उन पर एक साथ कई महिलाएं यौन शोषण का आरोप लगाए तो सवाल उठता है कि ये बड़े अदमी वास्तव में नारी सम्मान व सशक्तिकरण का कितना ख्याल रखते होंगे। आप ये स्वयं तय कर सकते हैं कि ये बड़े आदमी कितने बड़े हैं और कितने छोटे हैं। जब ऐसे बड़े लोग अपने वकीलों की फौज ले कर किसी के खिलाफ़ मानहानि का दावा करते हैं, तो बड़े से बड़े धुरंधर का पसीना छूट जाना स्वाभाविक हैं। और ये बड़े लोग किसी एक महिला के खिलाफ़ खड़े हो जाए, तो समझा जा सकता है कि उस महिला की क्या हालत हो सकती है। दरअसल ये हमारे पितृसत्तात्मक समाज में महिला के प्रति पुरूष के दोहरे मापदंड, वर्चस्व व खोखली ठसक का मंज़रनामा है।
      परन्तु वह डरी नहीं है और उसने लड़ने का ऐलान कर दिया है। उसने जवाब दिया है: "मैं अपने ख़िलाफ़ मानहानि के आरोपों पर लड़ने के लिए तैयार हूं। सच और सिर्फ सच ही मेरा बचाव है।" वह अकेली प्रिया रमानी का जवाब नहीं है, बल्कि उस जैसी कई महिलाओं का जवाब है जिसने मर्द की ज़यादती के विरुद्ध आवाज़ उठाने का फ़ैसला कर लिया है। एक तरफ़ वकीलों की फौज है, पितृसत्तात्मक समाज की संकीर्ण सोच है और दूसरी तरफ प्रगतिशील सोच रखने वाली नारी जिसने खामोशी और घुटन के दायरे से बाहर आने का बीड़ा उठा लिया है। हम सवाल करने पर मज़बूर है कि अबला कौन है – वह नारी या उसको को रौंदने की चेष्ठा करने वाले पुरुष प्रधान समाज की फौज व इसके संकीर्ण दायरे? अब तो प्रिया रमानी, गजाला वहाब, सुपर्ना शर्मा सहित उन महिलाओं की कतार बहुत लंबी हौ गई है जिन्होंने एक नहीं बल्कि कई कई-बड़े लोगों पर यौन उत्पीड़न व प्रीडेटरी बिहेवियर का आरोप लगाया है। 20 महिलाओं ने तो अदालत में न्यायधीश के सामने ग्रैट संपादक के यौन शोषण से जुड़े मानहानि के मामले में गवाही देने की गुहार भी लगाई है। इसी बीच बॉलिवुड व मीडिया जगत में ’मी टू’ के तहत यौन शोषण को ले कर जिस तरह से महिलाएं आगे आ रहीं हैं, उससे इन हल्कों में खलबली तो मची ही है और साथ इन चकाचौंध वाले क्षेत्रों की पर्दे के पीछे छुपी घिनौनी सूरत सामने आ रही है।
      वास्तव में प्रिया रमानी व अन्य महिलाओं का जवाब उन सब मर्दों के लिए चेतावनी है जो महिला को सिर्फ़ वासना की भूख मिटाने का साधन समझते है, उसके अंगों को हसरत भरी निगाहों से देखते हैं, उन्हें छूने का प्रयास करते है, कार्यस्थल पर अपने ऊंचे औधे का दुरुपयोग करते हैं और मौका पा कर उन्हें रोंद डालते हैं। अपने-अपने प्रसंगों व संदर्भों के साथ आप-बीती की व्याख्या करने वाली इतनी सारी महिलाओं का भला क्या राजनीतिक उद्देश्य हो सकता है? जिस तरह से आजकल एक के बाद एक महिलाएं 'मी टू' के माध्यम से उनके साथ हुए यौन दुराचार के विरुद्ध आवाज उठा रही हैं, वो खबरदार करता है कि अब नारी ज़्यादा देर तक मर्द की मनमर्ज़ी व शोषण के विरुद्ध चुप नहीं रहेगी। कार्यालयों में अब उनके बॉस उनका लैंगिक शोषण नहीं कर सकते। अगर ऐसा करेंगे तो कुर्सी से हाथ धोना पड़ सकता है क्योंकि मंत्री जी की जा सकती है, तो ये बॉस क्या चीज़ हैं। मान लेना चाहिए कि प्रोग्रैसिव सोच रखने वाली महिलाओं ने अपनी आवाज़ बुलंद करने का निश्चय कर लिया है, फ़िर चाहे किसी नेता या ग्रैट संपादक का हरम हो, अपनी कलम और खुफिया कैमरे के इस्तेमाल से तहलका मचाने वाला कोई तेजपाल हो, कोई फ़िलमी दुनिया का संस्कारी नाथ हो, ताबड़तोड़ अंग्रेज़ी बोलने की ठसक रखने वाला कोई वीआइपी हो, हाफ़ फ़्रैंड या फ़ुल गर्लफ़्रैंड का कोई लेखक हो, बॉलीवुड का कोई नायक-खलनायक हो, डारैक्टर-प्रॉड्युसर हो, किसी अखबार या न्यूज़ चैनल का कोई पत्रकार हो, पी.एच.डी करवाने वाला कोई प्रोफेसर हो, इंटर्नशिप करवाने वाला कोई नामी वकील हो। मतलब ये है कि कोई भी हो, नारी अब चुप नहीं रहेगी क्योंकि वो अब ’मी टू’ के ज़माने में रह रही है।
      कई बहस करने वाले सवालिया तर्क पेश कर रहे हैं कि पहले क्यों नहीं बोला? जब तब नहीं बोला, तो अब ही क्यों बोला? हां, ये सवाल हो सकते हैं, परन्तु ये सवाल ऐसे नहीं कि लाजवाब कर दे। इनके जवाब हैं। पहले कोई ऐसा मंच नहीं था जहां महिलाएं खुले तौर पर अपने साथ हुए दुराचार की बात कर सकती। आज वक्त बदला है। आज महिलाओं के अधिकारो की रक्षा के लिए संगठन हैं, संस्थाएं हैं, सोशल मीडिया है, ट्विटर है, फ़ेसबुक है, व्टसऐप हैं और अब ’मी टू’ है जहां वे अपनी बात रख पा रही हैं। तब वे आर्थिक रूप से कमज़ोर थी और अब आर्थिक तौर पर आत्मनिर्भर हैं।  
दरअसल ये महिलाएं कहना चाह रही है कि वो दिन लद गए जब जुए में हार दी जाने वाली द्रौपदी की तरह उसे चीरहरण के लिए वाध्य किया जाता रहा, जब पितृसत्तात्मक समाज के कहने पर सीता की तरह उनसे पाकदामन होने के प्रमाण मांगे जाते रहे। अगर पहले वो जो नहीं कह पाई, आज कह रही है, तो संकेत नारी उन्नति के हैं। यह तो एक उन्नत व आज़ाद नारी समाज का प्रतीक है। मैं ये तो नहीं कह रहा हूं कि ’मी टू’ अभियान के तहत सामने आ रहे मामले यथावत सत्य है, परंतु ये भी कैसे मान लिया जाए कि वे सब असत्य पर आधारित हैं। क्या कितना सच है, क्या कितना झूठ है, ये तो जांच व न्यायालय के फ़ैसलों पर निर्भर करेगा। परंतु धुंवा उठा है, तो कहीं आग तो लगी है।
      बड़ी बात है कि महिलाओं ने वो बोलने की हिम्मत तो की है, जो वह कह नहीं पाती थी। कम से कम उसे बोलने तो दीजिए। ये ज़रूरी नहीं कि नारी केवल श्रद्धा की मूर्त बनी रहे। उसे ताड़ित व प्रताड़ित करना मर्द का अधिकार नहीं बल्कि अमानवीय अपराध है। जिसके आंचल में दूध है, उसकी आंखों में आंसू क्यों हो? होना तो ये चाहिए की पुरूष भी 'मी टू' जैसे नारी मंचों का समर्थन करे। उसे 'मी टू' को सशक्त बनाने के लिए अभियान चलाना चाहिए जिसके तहत पुरुष भी महिलाओं का यौन शोषण करने वाले पुरुषों को सामने लाए। तब पुरुष भी ऐसे प्रिडेटर को कह सकेगा - तुम भी ऐसे अर्थात 'यू टू' ग्रैट अकबर!'


पगडंडियां जीवन की

(1)
रोज़ सवेरे घर से निकलना और पहाडी से उतरना
फिर चढना और सांझ ढलते ही घर को लौट आना
पहाडी को चीरती इन संकरी पगडंडियों पर चलना
बक खाती पगडंडियों पर टेढ़े-मेढ़े कर पांव टिकाना
वो टिक टिक कर चलना वो झुक झुक कर चलना
पांव फिसलना और कोई डाली थाम कर संभलना
ठोकर खा कर गिर पड़ना और गिर कर उठ जाना
झुलसती धूप और कभी बारिष में तरबतर हो जाना
इधर कल कल करती नदिया उधर झरने का गाना
तेज़ सर्द हवा के झौंके और बालों का बिखर जाना
पसीने की बूंदों का टपक कर चेहरे पर ठहर जाना
थक कर हांफते हुए उस पुराने पत्थर पर बैठ जाना
दशकों पहले इस पत्थर के लिए लड़ना-झगड़ना
जीत कर टांग पर टांग धर साहब बन बैठ जाना
(2)
यही पहाड़ी यही पगडंडियां यही पत्थर
इन्हीं पगडंडियों से गुजरा है
बचपन का वो ज़माना
पर तब मस्ती थी, एक खेल था
इन पगडंडियों से गुजरना
मगर अब बोझ हैं, फिक्र है, डर है
इन पगडंडियों से गुजरना
तब नहीं रुकते थे मचलते कदम
इन पगडंडियों पर
मगर अब डगमग करते है पग
इन पगडंडियों पर
तब नहीं था थकान का कोई एहसास
इन पगडंडियों पर
मगर अब हांफती हैं थकान भरी सांसे
इन पगडंडियों पर
(3)
तंग पगडंडियों से खुली सड़क पर आना
खुली सड़क से पगडंडियों में लौट जाना
बस ऐसा ही है ये रोज का आना जाना
शिखर से शून्य, शून्य से शिखर पर आना
(4)
गीत गाती, जीने की राह दिखाती है
ये पगडंडियां
धूप छांव की घटती-बढ़ती चादर है
ये पगडंडियों
जो नहीं किताबों में वही सबक है
ये पगडंडियों
(5)
चल, तू चल, ऐ राही !
तुमको चलना है अविरत इन्हीं पगडंडियों पर
नदिया जैसे चले कोई कल कल
धारा जैसे चले कोई छल छल
ये जीवन है चल चला चल
-----जगदीश बाली

Sunday, 8 October 2017

विधवा पुनर्विवाह को भी समाज मान्यता दे


अखबारों में जब ये खबर पढ़ी कि बिलासपुर के कुलवाड़ी गाँव के सुखदेव ने अपनी विधवा हुई बहू को बेटी मान कर उसका पुन: विवाह करवाया, तो दिल को एक अलग ही मुसर्रत हासिल हुई। यह स्त्री के प्रति संवेदना, सहानुभूति और सम्मान का एक अनूठा उदाहरण है। जिस समाज में आज भी स्त्री के पुनर्विवाह को हिकारत की निगाहों से देखा जाता है, उस समाज में इस तरह की मिसाल पेश करना अपने आप में प्रशंसनीय है। वास्तव में पुरूष प्रधान समाज में इसी तरह के उदाहरण नारी को उसका सही स्थान हासिल करने में मील का पत्थर साबित होंगे। यही वो सोच है, जो पितृसत्तात्मक समाज में नारी को उसका उचित स्थान दिला सकती है। पत्नि की म्रुत्यु के बाद जब पुरुष की शादी पर कोई उंगली नहीं उठती, तो स्त्री के विधवा होने पर उसकी शादी को भी समाज वो मान्यता क्यों नहीं देता?  
      दरअसल हमारे समाज के कायदे कानून हमेशा से पुरूष बनाता आया है। उसने अपने हिसाब से, अपनी सुविधा के अनुसार, अपने लिए ये कायदे कानून बनाए हैं। कहने को तो कहा जाता है कि नारी पुरूष का आधा अंग होती है और अंग्रेज़ी में उसे बैटर हाफ़ कहते हैं, परन्तु पुरूष की अपेक्षा नारी को ही त्याग और समर्पण करना पड़ता है। उसे ही कुंठित, अपमानित और शोषित होना पड़ता है। जब रावण का संहार कर राम चंद्र जी सीता को वापिस ले आए, तो उन्हें पवित्रता साबित करने के लिए अग्नि परीक्षा देनी पड़ी थी। सीता की पवित्रता का प्रमाण देने के लिए स्वर्ग से देवता भी उतर आए थे और फिर राम चंद्र जी ने सीता को वापस स्वीकारा था। बाद में सीता को गृह त्याग कर जंगल जाना पड़ा था। जब सावित्री का विवाह सत्यवान् से हो चुका था तो एक दिन नारद जी ने उससे कहा -- तुम्हारा पति सत्यवान केवल एक वर्ष ही जीएगा। यह सुनने के बाद भी सावित्री हर तरह से अपना पत्नि धर्म निभाती रही। सत्यवान की आयु क्षरण होने के बावज़ूद भी यम राज को सावित्री को उसका पति लौटाना पड़ा था और उसे चार सौ वर्ष की नवीन आयु भी प्रदान की थी। द्यूत-क्रीड़ा में जब पाँडव हार गए, तो युधिष्टर ने द्रौपदी को दाँव पर लगाया था, अपने भाइयों मेसे किसी को नहीं और द्रौपदी को चीर हरण का सामना करना पड़ा था। उस वक़्त भी भीष्म पिता माह जैसे धर्मपालक खामोश रहे थे। बड़े पुरूष के संबंध चाहे कितनी भी स्त्रियों से क्यों न हो, समाज अमूमन उस पर उंगली नहीं उठाता। मगर किसी महिला के ऐसे संबंधों की अफ़वाह मात्र से ही यह समाज उसे किन-किन निकृष्ट शब्दों से तिरस्कृत करने लग जाता है। ऐसा नारी के साथ कल भी हुआ, आज भी हो रहा रहा है और शायद आगे भी! परन्तु आखिर कब तक और क्यों?
      जब कभी किसी की पत्नि की मृत्यु होती है, तो पुरूष कुछ ही समय के बाद अपनी सुविधा और स्थिति के अनुसार दूसरी शादी कर लेता है। समाज इस बात को बुरा भी नहीं मानता और बिना किसी हील हुज्जत के मान्यता भी दे देता है। ये भी नहीं पूछा जाता कि उस पुरूष की उम्र क्या है, कितने बच्चे हैं इत्यादि, इत्यादि। उधर विधवा हुई स्त्री के लिए ऐसा करना आसान नहीं होता चाहे उसके पति की मृत्यु शादी के कुछ ही समय बाद हो जाए। कुछ विधवा महिलाएं तो ये सोच कर जीवन जी लेती हैं कि अपनी संतान का लालन पालन करना ही उनका उद्देश्य है। परन्तु उन विधवा हुई महिलाओं का जीवन तो पीड़ा से भर जाता है जिनके पास न पति का साथ रहता है न ही जीने के लिए संतान का सुख और सहारा। समाज ये नहीं सोचता कि पति अर्थात जीवन साथी की मृत्यु के बाद कैसे विधवा के लिए ज़िंदगी पहाड़ जैसी बन जाती है। पुनर्विवाह करना तो दूर इसके बारे में सोचने से पहले भी उसे कई बार सोचना पड़ता है। कई बार तो उसे ही पति की मृत्यु का कारण मान कर कफष्ट कह दिया जाता है। वह चाह कर भी पुनर्विवाह के बारे में सोच नहीं सकती क्योंकि समाज की परंपराएं दीवार बन कर खड़ी होती हैं। ये समाज, वो रिश्तेदार तरह तरह की बातें करते हैं। उसे घिसी-पिटी तर्कहीन सामाजिक मर्यादाओं की लक्ष्मण रेखा में बाँध लिया जाता है या वह खुद ही इनमें बंध जाती है। लोग क्या कहेंगे - ये रोग उसके जीवन के सपनों को सदा के लिए दफ़न कर देता है। कोई अगर दूसरा विवाह कर लेती है, तो भी समाज उस पर तंज़ कसने में कोई कसर नहीं छोड़ता। कुलमिला कर एक विधवा की ज़िंदगी दर्द, आह और आँसू के घेरे में कैद हो जाती है।  
        विवाह बेदी पर सात फेरे लेने के बाद केवल स्त्री ही क्यों सात जन्मों के लिए पति से बंध जाती है, पुरूष क्यों नहीं? जब पुरूष अपनी पत्नि की मृत्यु के बाद इस बंधन से मुक्त हो सकता है, तो पत्नि को भी अपने पति की मृत्यु के बाद स्वेच्छा से बंधन तोड़ने का अधिकार होना चाहिए। एक सपने के मर जाने के बाद स्त्री का जीवन क्यों मर जाता है? कुलवाड़ी गाँव के उस परिवार को नमन जिसने अपनी बहू को एक नया जीवन जीने की राह प्रशस्त की।

     

Sunday, 24 September 2017

sसिमटती दुनिया बढ़ते भाषाओं के दायरे


भाषा वही जो दिलों में उतर जाए। जो भाषा दिल में नहीं उतरती, वो जनमानस की भाषा नहीं बन सकती और जो भाषा जनमानस की नहीं बन सकती, वो कभी विकसित नहीं हो सकती। यह महत्वपूर्ण है कि किसे कौनसी बात किस भाषा में समझ आती है। नेल्सन मंडेला ने कहा भी है: "अगर आप एक आदमी से उस भाषा में बात करते हैं जिसे वह समझता है, तो वह उसके दिमाग तक जाती है। वहीं अगर आप उसकी अपनी भाषा में बात करते हैं, तो वह उसके दिल में उतरती है।" इस बात में कोई संदेह नहीं कि निज भाषा में ही हम सबसे पहले अपने ज़ज़बातों व अहसासों को शब्दों का रूप देते हैं, परन्तु किसी की निज भाषा क्या है, यह एक व्यक्तिगत प्रश्न है।  
भले ही महनीय कवि भारतेन्दु हरिशचन्द्र ने अपनी प्रसिद्ध कविता मातृभाषा के प्रति' में कहा है - निज भाषा को उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल, परन्तु उनके इस कथन को आज की बदलती और सिमटती दुनियाँ के परिपेक्ष में देखने की आवश्यकता है क्योंकि भारतेन्दु युग से आज के युग तक आते आते काफ़ी कुछ बदल गया है। मैं ये नहीं कह रहा हूँ कि उनके द्वारा कही गयी बात की आज कोई प्रासंगिकता नहीं है। मैं सिर्फ़ इतना कह रहा हूँ कि उनके इस कथन का मायने आज वो नहीं है जो तब था, बल्कि इसका दायरा बढ़ा है। उनके कथन का आज ये आशय नहीं निकाला जा सकता कि सब की निज भाषा एक ही हो। मेरी निज भाषा हिंदी हो सकती है और आपकी कोई और तथा किसी तीसरे की कोई और। हाँ, इतना ज़रूर है कि हर किसी को अपनी भाषा का प्रचार करने का हक है और उसे ऐसा करना भी चाहिए।
हमारा देश के संविधान में बहुत सी भाषाओं को मान्यता दी गयी है, तो किसी एक भाषा को निज भाषा कैसे करार दिया जा सकता है। हिंदी वाले हिंदी का, अंग्रेज़ी वाले अंग्रेज़ी का, संस्कृत वाले संस्कृत का और कोई अन्य भाषा वाले अपनी अपनी भाषाओं का प्रचार करें। इसमें कोई समस्या नहीं। किसी जगह की की सभ्यता और संस्कृति को जानने के लिए आवश्यक है हम उस जगह की भाषा को समझे क्योंकि भाषा अपने साथ संस्कृति भी लेकर आती है। फ़िर आज तो हम गुगल, फ़ेसबुक और व्ट्सएप के प्रचार और संप्रेषण के उस युग में रह रहे हैं जहाँ हर देश पड़ोसी ही लगता है। रोज़गार के लिए या फ़िर अन्य किसी प्रयोजन से लोग एक-दूसरे देश आ जा रहे हैं। तो हम एक ही भाषा से चिपक पंगु बन कर तो नहीं बैठ सकते न। ऐसे में  बहुभाषिया होना एक काबिलेतारीफ़ सलाहियत है। विचारक योहान वुल्फगांग फ़ान गेटे, जिन्होंने कालिदास के अभिज्ञान शाकुन्तलम् का जर्मन भाषा में अनुवाद किया, ने कहा है: "जिसे किसी विदेशी भाषा का कोई ज्ञान नहीं, उसे अपनी भाषा का भी कोई ज्ञान नहीं होता।"
हर एक को अपनी भाषा को तरज़ीह देनी ही चाहिए, परन्तु इसके मायने ये भी नहीं है कि अन्य भाषाओं को हिकारत भरी निगाहों से देखा जाए। भारतेन्दु जी स्वयं बहुत सी भाषाओं का इल्म रखते थे। यदि, उर्दू, पंजाबी या अंग्रेज़ी बोलना या लिखना शुरू कर दूं, तो मैं हिंदू न रह कर मुसलमान, गोरा या सिक्ख हो जाता हूँ क्या? सोलहवीं शताब्दी के रोमन सम्राट चार्ल्स पंचम ने कहा था - मैं ईश्वर से स्पैनिश में, महिलाओं से इतालवी में. पुरूषों से ह्रैंच में और अप्ने घोड़ों से जर्मन में बातें करता हूँ - अर्थात जितनी अधिक भाषाएं आप जानते हैं, उतना ही बेहतर आप अपने विचारों का संप्रेषण कर सकते हैं। मैने हिंदी भाषा के ऐसे हिमायती भी देखें हैं जो कह-कह कर नहीं थकते कि अंग्रेज़ी भाषा से गुलामी की बू आती है, लेकिन ख़ुद 'मे आई कम इन', 'बाय-बाय', और 'थैंक यू' जैसे अंग्रेज़ी के शब्दों का प्रयोग करने में अपनी बड़ाई मानते हैं। वास्तव में भाषाएं बहनों की तरह होती हैं। वे कभी नहीं टकराती। टकराती तो भाषा के प्रति हमरी मानसिकता है।
अगर हम अपनी-अपनी भाषाओं के दायरे खींच ले, तो न तो भाषाओं का आदान-प्रदान होगा, न उनका विकास होगा और न ही हम एक दूसरे की संस्कृति से पूरी तरह वाकिफ़ हो पाएंगे। यदि सभी अपनी-अपनी भाषा का राग अलापने लगेंगे, तो भाषाओं का परस्पर मेल नहीं हो पाएगा। सोचिए अगर भाषाएं एक दूसरे से न मिलती, तो श्रीमदभगवद गीता को केवल हिंदु पढ़ पाते, कुरान मुसलमान ही पढ़ते, आदिग्रन्थ केवल सिक्ख जानता और बाइबल केवल ईसाईयों तक सीमित रहती, परन्तु इन पुस्तकों का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद उपलब्ध होने से विश्व के लोग इन्हें पढ़ पाते हैं।
हमारे देश की आज़ादी में भी कई भाषाओं का योगदान रहा है। राष्ट्रगीत ’वंदे मातरम’ और राष्ट्रगान ’जन गण मन’ हमें बांग्ला ने दिए और ’सारे जहां से अच्छा...’ इकबाल की उर्दू भाषा में लिखी गई देश प्रेम की ग़ज़ल है। अगर ’दिल्ली चलो’, 'करो या मरो' 'जय हिंद' जैसे नारे हिंदी के हैं, तो क्रांति का प्रतीक ’इंक़िलाब ज़िन्दाबाद’ का नारा उर्दू ज़बान का है। टैगोर की ’गीतांजली’ को ब्यापक सम्मान अंग्रेज़ी में अनुवादित होने के उपरांत मिला। चाहे राम प्रसाद बिस्मल ने कहा - ’लगा रहे प्रेम हिन्दी में, पढूँ हिन्दी लिखुँ हिन्दी’, फ़िर भी उनका उर्दू से बहुत लगाव था। उन्होंने बिस्मल को अपना तख़ल्लुस बनाया और कई वतन परस्ती से लवरेज़ तराने लिखे। उन्होंने क्रान्तिकारी बिस्मिल अज़ीमाबादी द्वारा लिखित उर्दू तराना ’सरफ़रोशी की तमन्न्ना आज हमारे दिल में है...’ को एक नारा बनाया जिसे हम आज भी गुनगुनाते हैं। मुंशी प्रेमचंद की कहानियों और दुष्यंत कुमार की गज़लों में हिंदी व उर्दू जिस तरह से हमामेज़ हुई हैं, वह साहित्य को एक ख़ूबसूरत आयाम देता है। जहां हिंदी, उर्दू और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं ने देश की आज़ादी में अहम भूमिका निभाई, वहीं आधुनिक भारत के जनक राजाराम मोहन राय ने अंग्रेज़ी का इस्तमाल भारत पुनर्जागरण के लिए किया। उन्होंने इस भाषा को अंग्रेज़ों और भारतीयों के बीच सेतु स्थापित करने के लिए भी किया। ये भी नहीं भूलना चाहिए कि पंडित नेहरू. आर के नारायनन, राजा राव, किरन देसाई, अरुनधति रॉय, जैसे भारतीय लेखकों ने अंग्रेज़ी भाषा का इस्तमाल करके ऐसी साहित्यिक रचनाएं लिखी जिनसे विश्व में देश का नाम रोशन हुआ है।
किसी भी भाषा के विस्तार और विकास के लिए ज़रूरी है कि यह दूसरी भाषाओं के प्रति उदार रहे। जैसे हिंदी भाषा के ‘चपाती‘, ‘बिनदास‘ जैसे शब्दों के मुकाबिल दूसरी भाषा में नहीं मिलते, ठीक वैसे ही दूसरी ज़बान के कई अल्फ़ाज़ ऐसे हैं जिन के मुकाबिल हिंदी में नहीं जैसे उर्दू के ’इरशाद’ ’तख़लिया’ या और अंग्रेज़ी के स्पैम, (Spam) गुगली (Googly) जैसे शब्द। ज़बान के  अल्फ़ाज़ को हमामेज़ करने ही सलाहियत ही ज़बान को तरक्कीयाफ़दा बनाती है।
भाषा किसी की बांदी नहीं होती। इसे किसी खूंटे से नहीं बांधा जाना चाहिए अन्यथा यह ऐसे पिंजरे के पंछी की तरह हो जाती है जिसे ज़ीने के लिए दाना तो मिलता है, पर उसकी ऊड़ान कुंद रह जाती है। तेरहवीं शताब्दी इंग्लैंड के प्रसिद्ध वैज्ञानिक और दार्शनिक रोजर बेकन ने कहा था - ज्ञान की चॊटी पर हम विभिन्न भाषाओं को जान कर पहुंच सकते हैं। तो आइए भाषाओं का प्रयोग हम जोड़ने के लिए करें, तोड़ने के लिए नहीं।


बात-चीत का बिगड़ता मिज़ाज़


      किसी के बात-चीत के अंदाज़ से काफ़ी हद तक उसके व्यक्तित्व का अंदाज़ा लगाया जा सकता है क्योंकि हर एक का अंदाज़-ए-बयाँ अपना अपना होता है। परन्तु धीरे-धीरे हमारी आम बात-चीत में फ़ूहड़ता और भद्दापन आम हो गया है|
      कुछ रोज़ पहले एक शाम रोज़ाना की तरह टहल रहा था। टहलते टहलते एक छोटॆ से मैदान के पास से गुज़रना हुआ। वहां कुछ बच्चे खेल रहे थे। तभी मैने देखा एक छोटा सा बच्चा अपनी बहन के साथ झगड़ रहा है। बच्चे की उम्र कोई छः साल और उसकी बहन की उम्र तकरीबन आठ साल प्रतीत हो रही थी। झगड़ते झगड़ते अचानक बच्चे ने अपनी बहन को धक्का दिया और बोला - 'साली मा... लौ... ' बच्ची तो गिरते-गिरते बची और मम्मी, मम्मी चिल्लाने लगी, पर मैं उस नन्हें से बालक के मुंह से इन शब्दों को सुन कर हक्का बक्का रह गया। मैंने बच्चे को डांटते हुए कहा - 'गंदी बात करता है। ऐसा भी कोई बोलता है क्या?' बच्चा वहां से भागता हुआ बोला - 'जब पापा मम्मी से लड़ते हैं, वो भी तो मम्मी को ऐसा ही बोलते हैं।' ज़ाहिर है बच्चे ने ये भाषा अपने घर में ही सीखी होगी। इसमें बच्चे का दोष नहीं क्योकिं उसे तो ये मालूम भी नहीं होगा कि जो उसने कहा उसके मायने क्या क्या थे। जन्म लेते ही कोई बच्चा बोलना थोड़ी शुरू कर देता है।
      दरअसल हमारी रोज़ाना की भाषा में फूहड़पन और अभद्रता आ गयी है। अकसर बच्चे बड़ों के द्वारा इस्तेमाल की गयी भाषा को बड़ी जल्दी अपना लेते हैं। पैंट-कोट-टाई पहने हुए दो जेंटलमैन यार जब मिलते हैं, तो उनके सम्बोधन मैं भी भाषा का बिगड़ा हुआ मिज़ाज़ झलकता है। एक कहता है - ’और भई मा ... ।’ दूसरा जवाब यूँ ज़वाब देता है - ठीक हूँ भई पैं ... ' आत्मीयता मेँ वे भूल जाते हैं की उनके आस-पास भी दुनिया बसती है। अगर निकट कोई बच्चा हो तो बात दूर तलक पहुंच जाती है। उसे लगता है कि है शायद अपनेपन में ऐसा ही कहना चाहिए। हिंदी फ़िल्मों के संवादों व गानों में तो अब इस तरह की अलंकृत भाषा का इस्तेमाल आम होता जा रहा है।
      वैसे बात-चीत के बिगड़े हुए बोलों से आप  विद्यालयों मेँ भी रू--रू हो सकते हैं। मज़े की बात ये है कि छात्र ताबड़तोड़ इन एक्सपलेटिवज़ का इस्तेमाल करते हैं और उन्हें अहसास तक नहीं होता कि वे क्या बोल रहे हैं। कई बार तो गुरु लोग भी इनका इस्तेमाल करने में मज़बूर दिखते हैं। वे बेचारे भी क्या करें - ज़ुबान पर जो चढ़ गई है ये निगोड़ी ज़बान। किसी आम शौचालय की दीवारों पर जो कुछ लिखा मिलता है, वो लिखने वालों के अंदर छुपे मैल को दर्शाती है। कुछ महाशय अपने अंदर छुपी हुई इस शैतानी को शेर लिख कर भी दर्शाते हैं। कहते हैं कई बार तो ये महाशय मौका पा कर महिलाओं के शौचालयों में घुस कर भी अपनी सृजनात्मकता का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। ये देख कर छोटे बच्चे भी ऐसी भाषा सीख जाते हैं और छोटे मियाँ कई बार दो कदम आगे निकल जाते हैं - बड़े मियाँ तो बड़े मियाँ, छोटे सुभान अल्लाह।
      बच्चे छोटे ज़रूर होते हैं, पर उनके कान लंबे होते हैं अर्थात बच्चे इस बात के प्रति सचेत होते हैं कि माँ-बाप के बीच क्या बातें चल रही हैं। अगर माता-पिता अपने बच्चे को किताबों को सही क्रम में अल्मारी में रखने के लिए कहता है, तो वह इस बात को नज़र अंदाज़ कर सकता है, मगर माता-पिता के बीच होने वाले संवाद के प्रति वे बड़े सचेत होते हैं। दोनों के बीच चल रहे वाद-विवाद, आक्रामक बहस व कहा-सुनी को वे बड़े ग़ौर से सुनते हैं। अगर दोनों के बीच यह अकसर होता रहे, तो बच्चे की वाक्शैली पर इसका प्रभाव अवश्य नज़र आता है।
            जिस भाषा में बड़े बात करते हैं, जिस लहज़े और अंदाज़ में बड़े बोलते हैं, वही भाषा और अंदाज़ बच्चों का भी हो जाता है। बच्चे को किसी भी भाषा वाले माहौल में डाल दिया जाए, वह उस भाषा को बिना किसी औपचारिक पढ़ाई के ही सीख जाता है। वे अकसर वही भाषा बोलते हैं, जो वे बड़ों को कहते हुए सुनते हैं। यदि वे बड़ों को गाली-ग़लोज़ करते हुए सुनते हैं, तो वे भी गाली देना सीख जाते हैं; यदि बड़े गुस्से में चिल्लाते हैं, वे भी चिल्ला कर बोलना सीख जाते हैं। उन्हें कई शब्दों के मायने भी पता नहीं होते, परन्तु वे उनका प्रयोग कर लेते हैं। वे ऐसे-ऐसे शब्दों का प्रयोग कर लेते हैं, जिन्हें सुन कर घर के बड़े सन्न रह जाते हैं। कई बार तो वे टॉयलैट में लिखी अश्लील भाषा के बारे में भी पूछ लेते हैं। दरअसल बड़ों के द्वारा प्रयोग की गई आक्रामक, गंदी व अश्लील भाषा जुकाम की तरह फ़ैलती है - बड़े से बच्चे को, बच्चे से बच्चे को और फिर सारे बच्चों को। 
      भाषा का ज्ञान न होना अलग बात है, परन्तु फूहड़ और अभद्र भाषा का नियमित तौर पर इस्तेमाल समाज में बढ़ रहे छिछोरेपन व विकृत  मानसिकता को दर्शाता है। मैं हिंदी दीवस पर अपनी भाषा की पैरवी करने वाले भाषा के पंडियों से ये नहीं पूछूंगा कि हिंदी की पैरवी करने वाले कितनों को मालूम है कि कवर्ग के बाद टवर्ग आता है या चवर्ग। मुझे इससे भी कोई गिला नहीं कि हिंदी की पैरवी करते-करते कितने ’गांधी’ को ’घांदी’ और ’गधा’ को ’घदा’ बोलते हैं, नाले’ को ’नाड़ा’ बोलते हैं। मैं इतनी इल्तज़ा ज़रूर करूंगा कि भाषा के बिगड़ते मिज़ाज़ पर भी कुछ चर्चा कर लें, तो शायद आने वाले समय में कम से कम आम बोल-चाल में फ़ूहड़पन कुछ तो कम होगा। लेखक जेम्ज़ रोज़ोफ का कहना है - 'भाषा की फूहड़ता बढ़िया मदिरा की तरह होता है, जिसका इस्तेमाल एक ख़ास समूह मेँ ख़ास समय पर ही किया जा सकता है।‘
    




जिसके आँचल में दूध है, उसकी आंखों में पानी क्यों?

       घर में जब कोई मेहमान आता है, तो मा-बाप कहते है - बेटी चाए तो बना लाओ। बेटा चाहे पास बैठा हो या टी.वी. पर क्रिकेट मैच देख रहा हो या मोबाइल फ़ोन पर गैम खेल रहा हो, उसे ऐसा करने के लिए नहीं कहा जाता। अगर उससे ऐसा कह भी दिया जाए तो, छोटे लाल कहते हैं - ये तो दीदी करेगी क्योंकि वो लड़की है। माँ थकान महसूस कर रही हो, तो वो कहती है - बेटी जरा बर्तन तो धो लो। आज ज़रा चपाती तो बना लो। बेटी, जरा झाड़ू तो लगा। ये मत करो, वो मत करो, इतनी देर कहाँ थी, ये मत पहनो, वो मत पहनो, तुम लड़की हो। औरों के घर जाओगी, तो वे क्या कहेंगे? इन्हीं शब्दों के साथ शुरू होती है ज़्यादातर घरों की बेटियों की कहानी और इन्हीं शब्दों से गढ़े हुए माहौल में वह पलती बड़ी होती है। बेटी से बहन, पत्नि और माँ बनते-बनते भेदभाव की दीवार पुख़्ता होती जाती है, ये मानसिकता मज़बूत होती जाती है और नारी इसे अपनी नियती समझ कर अपना किरदार चाहे-अनचाहे निभाती जाती है। उसके जीवन के इस सफ़र में कहानी वही रहती है, एक ऐसी कहानी जिसमें केवल पात्र बदलते रहते हैं, नाम बदलते रहते हैं, परन्तु घटनाएँ वही रहती है - शोषण, बलात्कार, दहेज़, भ्रूण हत्या, अशिक्षा। जब निर्भया, गुड़िया जैसी दिल दहला देने वाली घटनाएँ होती हैं, तो मैथिली शरण गुप्त की ये पंक्तियाँ अनायास ही याद हो आती है - अबला जीवन तेरी हाय यही कहानी, आँचल में है दूध और आंखों में पानी।
      आज के आधुनिक युग में भी ऐसा क्यों? मैं ये तो नहीं कह रहा हूँ कि हमारे देश में नारी ने तरक्की नहीं की है। दरअसल हमारा नारी समाज दो वर्गों में बंटा है - एक वर्ग में सरोजनी नायडू, इंदिरा गांधी, किरन देसाई, नीरजा भनोट, सुषमा स्वराज, कल्पना चावला, किरन बेदी, सानिया मिर्ज़ा, पी वी सिंधू, दीपा कर्माकर जैसी प्रगतिशील और सशक्त महिलाएँ हैं, जिन्होंने यही सिद्ध किया है महिलाएँ अपने बलबूते अपने आप को बुलंदियों पर स्थापित कर सकती हैं। ये किसी आरक्षण की मोहताज़ नहीं। परन्तु हमारे नारी समाज का एक बहुत बडा वर्ग ऐसी महिलाओं का है, जो कोने में दुबक कर एक शून्य की जिन्दगी जी रही हैं। वे पुरूष प्रधान समाज की रूढिवादी सोच को या तो अपना भाग्य मान बैठी हैं या फिर धर्म मान कर रिश्ते निभा रही हैं, पति की सेवा कर रही हैं और पुरूष की ज़्यादती को सहन कर रही हैं। ज़ुल्म होने पर भी शिकायत नहीं करतीं, अगर करती हैं, तो उनकी आवाज़ को दबा दिया दिया जाता है। वे पुरूष की ताड़ना और प्रताड़ना का शिकार बन जाती हैं। ऐसी कई घटनाएँ होती हैं, जो या तो दर्ज़ नहीं होती या नज़र में नहीं आ पाती या फ़िर अख़बारों की सुर्खियाँ नहीं बन पाती। यही वह वर्ग है जिसमें नारी शून्य की ज़िंदगी गुज़ार रही है। इस शून्य से बाहर कॆसे लाया जाए? यह एक यक्ष प्रश्न है।
      वास्तव में नारी सशक्तिकरण का मामला नारी और पुरूष दोनों की मानसिकता से जुड़ा हुआ सवाल है। प्राचीन काल से पितृसत्तात्मक समाज में कायदे कानून पुरूष ही बनाता आया है। उसे जब-जब जैसा सुविधाजनक लगा, उसने तब-तब नारी को उस सोच में ढाल दिया। कभी शास्त्रों में उसने कहा - यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:, उसने कहा- ढोर, गँवार, शूद्र, पशु और नारी, ये सब ताड़न के अधिकारी, उसने कहा - नारी तुम केवल श्रद्धा हो...। अर्थात पुरूष ने अपनी सुविधा के अनुसार नारी को परिभाषित करने का प्रयास किया। पितृसत्तात्मक समाज में पुरुष नारी पर विजय चाहता है और नारी समर्पित होती चली जाती है, पुरुष उसे लूटना चाहता है और नारी लुटती चली जाती है। अग्नि में बैठकर अपने आपको पवित्र प्रमाणित करने वाली स्वच्छ सीता पितृसत्तात्मक समाज में नारी वेदना की परिचायक है।
      इस पितृसत्तात्मक व्यवस्था से उगने वाली मनोवृति व रूढ़िता से पुरूष को बाहर आना होगा। जरा सोचिए आप ने अपने-अपने घरों में अपनी माँ, पत्नी, बहिन और बेटी को कितनी भागीदारी, आज़ादी व अधिकार दिए हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि आप गलियों मैं नारी सम्मान का ढोल पीटते हैं और अपने घर में उन पर अपने मर्द होंने की धौंस जमाते हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि भाषणों में तो आप नारी को शक्ति का रूप मानते हैं, परन्तु मन ही मन उसे अबला समझते हैं? आप उन्हें घर के सामाजिक व आर्थिक निर्णय लेने में कितनी भागीदारी देते हैं? कहीं आप बेटा और बेटी को शिक्षा दिलाने के मामले में बेटी के साथ अन्याय तो नहीं कर रहे हैं? ये सवाल अपने आप से कीजिए। अगर वाकई आप अपने घरों में भी नारी का सम्मान कर पाते हैं और उन्हें बराबरी का स्थान देते हैं, तो महिला आरक्षण विधेयक व घरेलु हिंसा निरोधक जैसे कानून की आवश्यकता ही नहीं, न ही नारी को सड़क पर नारे लगाने की जरूरत है। वास्तव में पुरुष को ज़हनी तौर से नारी को उसका स्थान देना होगा।
      नारी उत्थान के लिए नारी को स्वयं भी सचेत होना होगा। उसे हाथ पसार कर नहीं, बल्कि अपनी शक्ति को स्वयं पहचान कर आगे बढ़ने की आवश्यकता है। महज़ आरक्षण व कानून के सहारे बैठ कर नारी सशक्त नहीं हो सकती। वास्तव में नारी को स्वयं को अंधयारे से बाहर लाना होगा। उसे सुशिक्षित हो कर खुद को बौद्धिक व आर्थिक स्तर पर पुरूष के समकक्ष खड़ा होना होगा। ऐसा नहीं है कि आज की नारी को मौका नहीं मिल रहा। देखना होगा की नारी को यह सब कुछ मिलने के बाद भी क्या वह अपने अधिकरों का प्रयोग करने में आज़ाद है। उदाहरत: स्थानीय निकायों में कितनी ही महिलाएँ चुन कर आती हैं, परन्तु वे या तो निष्क्रीय हो जाती हैं या उनकी डोर पति के हाथ में ही रहती है। 
      कहते हैं जिस घर में बहू बेटियों की इज़्ज़त नहीं, उस घर में बरकत नहीं होती। नारी किसी भी समाज का आधा हिस्सा होता है और पुरूष का आधा अंग। इस आधे हिस्से और अंग के बगैर न कोई व्यक्ति फल फूल सकता है और न ही समाज उन्नति कर सकता है। आज के बदलते परिवेश में नारी ताड़न की अधिकारी नहीं। य़ह भी आवश्यक नहीं कि वह हमेशा श्रद्धा बन कर पुरूष के आंगन में पीयूष स्रोत सी बहती रहे। अहम बात है कि पुरुष को नारी की आज़ादी को स्वीकारना होगा। कवि जयशंकर प्रसाद ने हमें सावधान करते हुए कहा है - जिसे तुम समझे हो अभिशाप,
जगत की ज्वालाओं का मूल। ईश का वो रहस्य वरदान
, कभी मत उसको जाओ भूल।
      नारी को भी अपने हिस्से की धूप चाहिए, उसे भी अपने हिस्से का आसमां चाहिए, उसे भी अपने हिस्से का जहाँ चाहिए, जहाँ वह भी पुरुष की तरह स्वछन्द विचारों की उडान भर सके। आखिर जिस नारी के आँचल में संसार के लिए दूध है, संसार उस नारी की आंखों में पानी क्यों दे जाता है?


Thursday, 17 August 2017

एहसास

तूने कॉलेज की.खिड़की पर फेंका है जो पत्थर \
और चूर चूर हो गया है काँच
ये बिखरे टुकड़े नहीं काँच के बल्कि बिखरे पड़े हैं सपने
जो तुम्हारे लिए देखे हैं माँ बाप ने
कि  बेटा पढ़ेगा लिखेगा कमाएगा खूब नाम
ये तूने  घोंप डाला है  जो किसी को खंज़र
और टपक पड़े  हैं सड़क पर लहू के कतरे
ये कतरे नहीं हैं कतरे केवल लहू के
बल्कि दास्तां बयां करते हैं क़त्ल हुए उन सपनों की
तुमाहरी उंगलियों के बीच शान से कसी वो सिगरेट और
हर काश के साथ निकलते वो धुंए उन लच्छों
में है बेबस मां की सिसकियां और बाप की थमती साँसे

तुम्हारा पत्थर फैंकना भी हो सकता था जायज़
मगर तभी अगर वो पत्थर तुमहारा होता
पर अफसोस! वो पत्थर तुम्हारा न था
तुम्हारा तो सिर्फ हाथ था
हाथ तुम्हारा था, पत्थर उनका था
हाथ तुम्हारा था, खंजर उनका था
वो सिगरेट, वो धुंआ  सब उनका था

एक दिन आएगा जब तुम छताओगे
तब तुम्हें एहसास होगा
काश! मेरे हाथ में पत्थर न होता
मेरे हाथ में कलम होती
मेरे हाथ में कागज़ होता
तो मैं एक नक्शा बनाता
नक्शा बनाता एक हिंदोस्तान का
पर तब शायद बहुत देर हो चुकी होगी
जब तुम्हें एहसास होगा -
क्या होता है माँ बाप के सपनों का मर जाना
और क्या  होता है माँ बाप के होंठों से हंसी का चले जाना



Sunday, 12 March 2017

अगर शब्द न होते...

खुदा ने इंसान को ज़ुबान दी, ज़ुबान के साथ ऐसा श्वस्नतंत्र दिया जिसका इस्तेमाल वह बोलने के लिए करता है। बोलने के लिए शब्द चाहिए। अपने ख़्यालों के इज़हार के लिए भी शब्द चाहिए। अगर शब्द न होते तो हम अपने ख्यालों को कैसे लिख पाते। शब्द न होते तो न ही किताबें लिखी जाती और न ही कुछ पढ़ने को होता। हम आज की तरह एस एम एस न कर पाते, न फ़ैसबुक पर कोई अपनी बात लिख कर स्टेटस डाल पाते। न ही कोई वट्सऐप पर चैट कर पाता, न कोई ट्वीट कर पाता। हम केवल फ़ोटो अपलोड कर पाते। हम इतनी सुगमता से पुराने यार दोस्तों को न खोज पाते। तब कुछ याद रह जाता और बहुत कुछ भूल जाता। कुछ भूली और कुछ बिसरी बातें शेष रह जाती। ये यादों के अफ़साने कुछ ही समय बाद दफ़्न हो जाते। कुछ अफ़सानों की कबरें होतीं तो कुछ कबरों के अफ़साने होते। ज़रा कल्पना कीजिए! अगर शब्द न होते तो इंसानों की दुनिया कैसी होती।
शब्द न होते तो हम अपनी बात कैसे कह पाते? हमारी भाषा कैसी होती? हम अपने सुख, दुख, खुशी, उत्साह, न्राराज़गी व गुस्से को कैसे व्यक्त करते? हमारी भाषा भी शायद वनों में में विचरण करने वाले प्राणियों की तरह होती, पालतु जन्तुओं की तरह होती और आकाश में विचरण करते पंछियों की तरह होती। हम अगर गुस्सा करते तो कुत्ते की तरह गुर्राते और चिल्लाना चाहते तो शायद उसी की तरह भौंकते। खुश होते तो इसका इज़हार शायद घोड़े की तरह हिनहिना कर करते या फ़िर गधे की तरह ढेंचु ढेंचु करते। ऐसे में इज़हारे मोहब्ब्त कैसे करते? शायद आंखों के ईशारे से ही सब कुछ समझना पड़ता और दिल जीतने का ये हुनर भी सीखना पड़ता क्योंकि न खत लिख पाते न वैलेंटाइन डे पर ग्रीटिंग कार्ड दे पाते। तब प्रेम कहानी तोता-मैना जैसी ही होती। अगर कोई कोयल की तरह कूक पाता तो उसे लता और रफ़ी की तरह अच्छा गायक समझा जाता। तब गीत न होते और अगर संगीत होता तो मंद मंद बहती हवा का होता, कल कल करते नालों का होता और झर झर करते झरनों का होता।
अगर शब्द न होते हम भला कैसे होते? बिना शब्दों की दुनिया में हम या तो मिस्टर बीन की तरह होते या चार्ली चैपलिन की तरह होते या फ़िर माइम के किसी एक्टर की तरह। आप किसी गूंगे की कल्पना भी कर सकते हैं। टीवी पर केवल ईशारों से ही समाचार दिखाये जाते और सिनेमा के रुपहले पर्दे की कहानी आलामारा से आगे न बढ़ती। तब केवल चार्ली चैपलिन या मिस्टर बीन जैसे ही अदाकार दिखते। तब कैसा लोकतंत्र होता? उस लोकतंत्र में विरोध के नारे न लगते, न कोई लिखित बैनर होते, न तख्तियों के सहारे कोई अपनी भड़ास निकाल पाता। तब शायद आदमी बंदरों के किसी दल की तरह शोर मचाते। ऐसे में कोई ब्यान न दे पाता और न ब्यान पर बवाल होता न सियासत। ऐसे में अभिव्यक्ति की आज़ादी कौन बात करता और क्या बात करता? तब न कोई अखबार होता, न कोई लिखता और न कोई पढ़ता। तब साहित्य कैसा होता? शायद होता ही नहीं।


तो बताइए क्या वो शब्दों के बगैर दुनिया हमारी शब्दों से बेहतर होती? वो दुनिया अलग ज़रूर होती, बेहतर नहीं या यों कहिए कि वो दुनिया अधूरी और निरस होती। सचमुच शब्द हमारी दुनिया को कई तरह के रंगों से भरते हैं। ये हमारी ज़िंदगी को नया आयाम देते हैं। शब्दों से हम समझते भी है और समझाते भी हैं। शब्द अपने आप में शक्ति हैं और किसी को भी शक्ति प्रदान करते हैं। ये शब्द आपकी भी शक्ति बन सकते हैं। कोई समझ ले तो एक शब्द भी जीवन बदल देता है, न समझो तो लाखों शब्द भी निरर्थक हैं। शब्द घाव भी देते हैं और घावों पर मरहम भी लगाते हैं।
शब्द आज़ाद है, पर उनका चुनाव करने के लिए आपको विवेकपूर्ण होना पड़ेगा। शब्द आप सुनते या पढ़ते ही नहीं, बल्कि वे एहसास दिलाते हैं। शब्दों की शक्ति असीम होती है। शब्द युद्ध और शान्ति दोनों करवाते हैं। कागज़ पर उतारे गए और मुंह बोले गये शब्द दुनिया में उथल पुथल मचा सकते हैं। शब्द धरा पर नहीं, दिलों पर पड़ते हैं और फ़िर बीज बन जाते हैं जिससे महाभारत जैसे युद्ध के भयानक वृक्ष भी अंकुरित हो सकते हैं या फ़िर विश्वशांति के पौधे। शब्द विध्वंसक परमाणु बम भी बन सकते हैं या पीड़ा से मुक्ति और मन को शीतलता देने वाली औषधि भी ।
बहुत नासमझ होते हैं वो जो कहते हैं - शब्दों में क्या रखा है? इतिहास गवाह है कि दुनिया को दिशा देने वाले वही लोग थे जो शब्दों की अहमियत को समझते थे। अच्छे शब्द बहुमूल्य होते हैं और उनके इस्तेमाल में कोई खर्च नहीं आता। शब्दों के चयन में की गयी चंद लम्हों की गलतियों के कारण सदियों पछताना पड़ता है। ज़ुबान में हड्डी नहीं, परन्तु इससे उगले हुए शब्द के तीर दिल को भेद कर रख देते हैं। कहा भी है - ख़ुदा को पसंद नहीं सख्तियां ज़ुबान की, इस लिए हड्डी नहीं ज़ुबान की।

Tuesday, 7 March 2017

लैफ़्ट-राइट, असहिष्णुता और अभिवयक्ति की आज़ादी

पिछले कई महीनों से देश में एक बहस चल रही है जो अभिव्यक्ति की आज़ादी, सहिष्णुता और असहिष्णुता के इर्द गिर्द घूमती रही है। हालांकि यह बहस कम है और शोर ज़्यादा लगता है। इस बहस को राजनीतिक दल, मिडिया चैनल्स व सोशल मिडिया अपने-अपने ढंग व सुविधा से परिभाषित करते रहे हैं और अपनी-अपनी सुविधा व फ़ायदे के अनुसार हवा दे रहे हैं। मुझे शरद जोशी का वयंग्य ’अंधों का हाथी’ याद आया जिसमें चार अंधे इस बात पर बहस छेड़ देते हैं कि हाथी कैसा है।
कोई मिडिया चैनल अपने चैनल् का पर्दा इतना काला कर देता है जैसे देश में अंधेरे के सिवाय कुछ नहीं बचा है। कुछ चैनल्स इतनी बुलंद आवाज़ में चिल्लाते रहते हैं मानो देश के कोने कोने में अच्छे दिन आ गये हैं। कई लेखकों को तो अचानक लगने लगा कि देश में एमरजैंसी जैसे हालात बन गये हैं और उनकी अभिव्यक्ति की आज़ादी इस कदर दबायी जा रही है कि उन्होंने अपने ईनामा वापस लौटा कर अपना गुस्सा ज़ाहिर किया। कुछ को आज़ाद भारत इतना बुरा लगने लगा है कि उन्हें अपने देश में रहने से डर लगने लगा है और इंडिया को इन्क्रेडिबल इंडिया कहने वालों को भी इसकी क्रेडिबिलिटी पर शक होने लगा है। कुछ इतने देश भक्त निकलते हैं कि असहिष्णुता की बात करने वालों को देशद्रोही करार देने में वक्त नहीं लेते और देश छोड़ने का फ़तवा नहीं तो सलाह तो दे ही देते हैं। कुछ को लगने लगा कि भारत माता की जय बोलेंगे तो उनका अधिकार छिन जाएगा, तो कुछ देश के टुकड़े-टुकड़े करने वाले और कश्मीर की आज़ादी के नारों को अभिव्यक्ति की आज़ादी करार देने पर अड़े हैं। हर वर्ष पंद्र्ह अगस्त को देश की आज़ादी का जश्न मनाने के बाद आज़ भी इन्हें कश्मीर की आज़ादी चाहिए। कोई कनैहिया बुराई से लड़ने वाला सुदर्शन चक्र धारी कृष्ण दिखाई देता है तो किसी किसी को उसकी आज़ादी की आवाज़ से देशद्रोह की गंध आने लगी है। संविधान व न्याय की बात करते करते फ़ैसला आने से पहले ही मिडिया व नेता उसे या तो देशद्रोही कहने लगे या फ़िर मसीहा।
सिक्कों के बल पर देश के कानून के दांव पेंच खेलकर जो कई रसूकदार लोग कत्ल के इल्ज़ाम से बरी हो जाते हैं वे भी इस देश में अपनी आज़ादी को छिना हुआ महसूस करता है और दहशत फ़ैलाने वालों को दहशतगर्द कहने से कतराते है। बेकसूर लोगों का कत्ल करने वाले याकूब मेमन जैसे आतंकवादी को बचाने लिए अपने आप को संविधान का पुजारी कहने वाले आधी रात को भी देश की सर्वोच्च अदालत का दरवाज़ा खटखटाते हैं और खुद को सैक्युलर और सहिष्णु साबित करते हैं। काश इतनी ही शिद्दत से वे गरीब, बेकस लोगों को इंसाफ़ दिलाने के लिए भी न्यालय के दरवाज़े खटखटाए जाते!
इस सारे शोर शराबे में कोई लैफ़्ट चलने लगा है और कोई राइट। इस लैफ़्ट-राइट के मार्च में दोनों तरफ़ एक भीड़ लगने लगी है और इस भीड़ में से हट कर जो राजनीति के डिब्बे से बाहर आ कर अपनी बात कहता है उसे ये भीड़ या इधर खींच रही है या उधर ठेल रही है। उसे कई तरह की संज्ञाएं दी जाने लगी है। किसी को कोई फ़ासिस्ट कह रहा है, तो किसी को नक्सली होने का प्रमाणपत्र मिल रहे हैं। किसी को संघी बत्ताया जाने लगा है और किसी को माओवादी। जिस दिन मैने नोटबंदी पर आम लोगों के मन में उठ रहे सवालों का ज़िक्र किया तो मुझे लैफ़टिस्ट कहा जाने लगा, जिस दिन मैने तिरंगे और भारत माता की जय की पैरवी की तो मुझे संघी बना दिया गया, जिस दिन मैने युनिफ़ॉर्म सिविल कोड के पक्ष में बात की तो मुझे मुस्लिम विरोधी बता दिया गया। किसी खालिद की बात नहीं करूंगा क्योंकि बवाल मच सकता है और मुझे भी वो नाम दे दिया जाएगा जो मैं नहीं हूं। मुझे नहीं मालूम कि इसे पढ़ने के बाद मुझे क्या नाम दिया जाएगा, पर मैं सिर्फ़ मैं हूं वो नहीं जो वो मुझे नाम देना चाहेंगे।
अब किसी ने तख्ती उठा ये संदेश दिया कि जो शहीद हुआ था, उसे युद्ध ने मारा था पाकिस्तान ने नहीं। हां, सही है कि युद्ध बुरी चीज़ है, पर जो युद्ध हुआ उसके लिए कोई तो ज़िम्मेदार रहा होगा। कह तो ये भी सकते हैं कि कोई माचिस की तिल्ली किसी के घर का चूल्हा जलाती है और किसी का घर भी राख कर देती है। कसूरवार न माचिस को मानिए या न आग लगाने वाले को, बस आग को मान लीजिए और हो सके तो तो उसे जेल में भी डाल दीजिए। इसी बीच एक शाहीद के पिता जी का ब्यान आया ’मेरे बेटे को युद्ध ने नहीं, पाकिस्तान ने मारा।’ खैर मान लेता हूं दोनों ने अपनी अपनी बात कही और अपने अपने तरीके से कही। अपनी बात कहने के लिए दोनों आज़ाद है जैसे मैं अपनी बात लिखने के लिए। परन्तु ये भी सत्य कि युद्ध स्वयंभू वस्तु नहीं है? जैसे ब्यान देना हर किसी अधिकार है, उसकी प्रतिक्रिया आना भी सहज बात है। इसलिए किसी को भी तिलमिलाना नहीं चाहिए - न लैफ़्ट को न राइट को। ब्यान देने वाले ब्यान दे हट गए। उनके ब्यान का क्या मतलब रहा होगा, वही बता सकते हैं परन्तु लैफ़्ट राइट तो चल ही रही है और बड़े ज़ोर शोर से चल रही है।
अपने विचारों को अभिवयक्त करना संविधान में प्रदत एक अधिकार है, मगर वही संविधान इस आज़ादी को संयमित भी करता है। आप बोलिए, ऊंची आवाज़ में बोलिए मगर आवाज़ इतनी ऊंची भी नहीं होनी चाहिए कि किसी पड़ोसी की नींद ही हराम हो जाए। आप बोलिए, गुस्सा कीजिए, अपनी नाराज़गी ज़ाहिर कीजिए, ज़ोर से बोलिए, मगर किसी को गाली देने का अधिकार न संविधान देता है न हमारे संस्कार। जो न संविधान की माने न संस्कार की तो आप तय कीजिए की वो किसकी मानता होगा। ज़रा सोचिए आप घर में कैसी भाषा का इस्तेमाल करते हैं। क्या मा या बहन की गाली देते हैं? नहीं देते तो घर के बाहर ये कायदे क्यों बदल जाते हैं। सरकारों से सवाल कीजिए, उनसे ज़वाब मांगिए। बहस कीजिए, मगर ज़ुबान संयमित रखिए। नारे लगाइए, विरोध कीजिए, मगर याद रखिए किसी मुल्क के ज़िंदाबाद से हमें तकलीफ़ नहीं मगर, ’भारत मुर्दाबाद’ बर्दाश्त से परे है। मीडिया का प्रश्नवादी होना ज़रूरी है। घटना भी दिखाइए, दुर्घटनाएं भी ज़रूर दिखाइए। अपने चैनल का पर्दा इतना भी अंधेरा न कीजिए कि लोगों को अंधेरे की ही आदत पड़ जाए। देश का रोशन चेहरा भी दिखाइए। बातें कीजिए, मगर बातें मत बनाइए। सहिष्णुता के मामले में इस देश का इतिहास अपने आप में प्रमाण है। हां, कमियां हर घर में होती है। उन कमियों की वजह से घर तोड़ लिया जाए तो कमियां हमारी हैं। याद रखिए - कौन सी बात कहां कैसे कहनी है, ये सलीका हो तो हर बात सुनी जाती है।

Saturday, 8 October 2016

हिमाचल विश्वविद्यालय हिंसा

इधर हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय प्राशासन राष्ट्रीय आंकलन एवं प्रत्यायन दल (नैक) से प्रदेश के इस उच्च शिक्षण संस्थान के लिए ए ग्रेड की आस लगाए बैठे हैं, उधर परिसर में खूनी संघर्ष चल रहा है। किसी के ज़िंदाबाद और किसी के मुर्दाबाद के नारों से गूंजते व खून से सने इस माहौल को देख कर वे हैरान ज़रूर हो रहे होंगे कि भोलेपन के लिए मशहूर इस शांतिप्रिय प्रदेश के उच्च शिक्षण संस्थान में ये कैसा घृणित व शर्मसार कर देमे वाला खूनी खेल चल रहा है। ऐसे में विश्विद्यालय की ग्रेडिंग करते समय नैक पशोपेश में ज़रूर पड जाएगा। अगर ए ग्रेड मिल भी गया तो उसके क्या मायने? विद्या के जिस परिसर में ज्ञान की महक का अहसास होना चाहिए, वहां अगर भय व असुरक्षा का वातावरण हो तो ग्रेड ए मिले या ज़ैड। जहां इल्म के चिराग जलने चाहिए, वहा अगर हिंसा का तांडव देखने को मिले, तो उस विश्वविद्यालय में अध्ययन की चाह रखने वालों पर क्या असर होगा। जिन हाथों में देश का नक्शा बनाने की कलम होनी चाहिए, उन हाथों में अगर पत्थर या तलवार आ जाए तो उस देश का नक्शा क्या होगा? जिन होस्टलों की अल्मारियां और मेज पुस्तकों से भरी होनी चाहिए, वहां अगर हॉकी, सरिये, ईंट और पत्थर का ज़खीरा मिले, तो अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं कि शिक्षा की क्या दशा है और यह किस दिशा में अग्रसर है। ये प्रदेश विश्वविद्यालय की कैसी तसवीर देश के सामने प्रस्तुत हो रही है।
नारेबाज़ी, पत्थरबाज़ी, लात-घघूंसे तो हिमाचल विश्वविद्यालय के लिए एक आम बात है। अगर इस विश्वविद्यालय के इतिहास में झांका जाए, तो हिंसक घटनाओं का काला इतिहास सामने आता है। आजकल विश्वविद्यालय में जो चल रहा है, उससे इसके इतिहास के लहू से सने पन्ने फ़िर सामने आ जाते हैं, जिन्हें हर हिमाचली बुद्धिजीवि भूलना चाहता है। 1979 में सुरेश सूद, 80 के दशक में नासिर खान व भारत भूषण और 1994 में कुलदीप ढढवालिया इस छत्र हिंसा में मौत का ग्रास बन गए थे। जिस भी छात्र संगठन को जब सुविधाजनक लगता है, वे प्रयेक कक्षा में जाकर कक्षाओं का बहिष्कार करवा देते हैं। कोई कक्षा न छोड़ने की हिमाकत नहीं कर सकता। अगर करता है, तो बहुत बड़ा जोखिम मोल लेता है। जो वाकई पढ़ना चाहते हैं वो जाएं तो कहां जाएं?
दरसल हिमाचल विश्वविद्यालय में हिंसा दोनों स्थितियों में होती है - जब प्रत्यक्ष चुनाव हो, तब भी और जब अप्रत्यक्ष हो, तब भी। पहली स्थिति में चुनाव के लिए हिंसा होती है, दूसरी स्थिति में चुनाव के कारण। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि विश्वविद्यालय में सक्रीय छात्र संगठन बड़े राजनैतिक दलों की शाखाएं हैं। ये दल विश्वविद्याल का इस्तमाल अपनी राजनैतिक हवा बनाने के लिए करते हैं। छात्र संगठनों के हाथ में जो पत्थर होता है, वो इनका अपना नहीं होता। इनके तो सिर्फ़ हाथ होते हैं और पत्थर राजनैतिक आकाओं द्वारा इन हाथों में थमाए जाते हैं। हिंसा का हल इस बात में है कि विश्वविद्यालय में राजनैतिक दल अपना हस्तक्षेप करना बंद कर दें। दलगत संगठनों पर रोक लगा कर भी प्रत्यक्ष चुनाव करवाए जा सकते हैं। कोई भी अपने स्तर पर चुनव लड़ सकता है। ऐसे में हिंसा होने के आसार भी बहुत कम हो जाएंगे और हर एक इच्छुक को प्रतिनिधित्व करने का अधिकार भी मिल जाएगा। मैरिट आधार पर प्रतिनिधी का चुनाव चुनावी हिंसा को तो रोक सकता है, परन्तु छात्र संगठनों के टकराव से उत्पन्न होने वाली हिंसा को नहीं। दूसरे यह आवशयक नहीं कि जो मैरिटोरियस है, वह एक अच्छा प्रतिनिधित्व भी दे पायेगा।
मां-बाप जब अपने बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए विश्वविद्यालय भेजते है, तो उनकी आंखों में सपने होते हैं - मेरा बेटा ये करेगा, वो करेगा। उन्हें एक उम्मीद होती है कि उनका लाल उनके सपनों को साकर करेगा। परन्तु विश्वविद्यालय परिसर के आस-पास बिखरे कांच के टुकड़े कई मा- बाप के बिखरे सपनों की गवाही देते हैं। उन्हें ये पता भी नहीं चल पाता कब उनका लाल शीशे और पत्थर के खेल में उलझ गया। अपने बेटे को शीशे और पत्थर के खेल का शिकार होते देख उनके सपने दम तोड़ने लगते हैं। जब वे इस तरह का भयावह माहौल देखत है तो वे मन मसोस कर रह जाते हैं। जब तक इन लालों को अहसास होगा, तो शायद बहुत देर हो चुकी होगी। फ़िर वे ज़रूर कहेंगे- काश मेरे हाथ में पत्थर की जगह कलम होती, किताब होती, कागज़ होता, तो मैं हिंदोस्तान का एक नक्शा बनाता।

Saturday, 1 October 2016

शिक्षण संस्थानों में हिंसा और गुरु-शिष्य के बीच बढती खाई

दिल्ली के सुलतानपुरी इलाके के एक सरकारी स्कूल में अध्यापक का अपने ही शिष्य द्वारा कत्ल करना गुरु-शिष्य के बीच बिगड़ते रिश्ते की पराकाष्ठा है। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि शिष्य गुरु का कत्ल तक करने पर उतर आया हो। हमारे प्रदेश में भी इस तरह की घटनाएं होती आयी हैं। 14 दिसम्बर 1998 में अरसू के एक सरकारी स्कूल के नवी कक्षा के एक छात्र ने प्रधानाचार्य पर सरिये से वार किया जिसके कारण उनकी मौत हो गयी। अगस्त 2014 में संजौली कॉलेज में छात्रों ने प्रधानाचार्य व अन्य शिख्शकों के साथ मार-पीट की थी। चंद रोज़ पहले गंगथ में सरकारी स्कूल के एक छात्र ने सुबह-सवेरे स्कूल ग्राउंड में प्रधानाचार्य का गला पकड़ लिया था। उनकी गलती ये थी कि उन्होंने उस छात्र को एक विद्यार्थि की तरह अनुशासित होने की हिदायत दी थी। इसके अलावा दिसंबर 2014 में झारखंड के एक स्कूल के सातवी कक्षा के तीन छात्रों ने अपने अध्यापक को इसलिए मार डाला क्योंकि उक्त अध्यापक ने उन्हें धुम्रपान न करने की सलाह दी थी। फ़रवरी 2012 में चिन्नई के एक स्कूल में नवी कक्षा के छात्र ने चाकू से अपने अध्यापक की जान ले ली। अध्यापकों से थप्पड़बाज़ी, गालीगलौज, बदसलूकी जैसी घटनाएं तो अब आम होती जा रहीं हैं।
जहां हमारे देश का इतिहास गुरु-शिष्य की आदर्श परंपरा के उदाहरणों से भरा पड़ा है, वहीं आज गुरु-शिष्य के बीच बढ़ती खाई एक ज्वलंत समस्या बन चुकी है। जिस देश में शिष्य अपने गुरु को देवतुल्य मानता आया है, वहीं आज इस रिश्ते में इतनी तलखी और हिकारत आ गयी है कि नौबत कत्ल तक पहुंच जाती है। विद्यालय में मुल्क के भविष्य को सींचा जाता है और भाग्य की रेखाएं खींची जाती है। इस मुकदस जगह पर इल्म के चिराग जला कर गुरु अपने शिष्य के अज्ञान के अंधेरे को दूर करने का प्रयास करता है और उसे अनुशासन, संस्कार और शिष्टाचार का सबक पढ़ाता है। परन्तु जो कुछ घटित हो रहा है, उससे साफ़ ज़ाहिर है कि धीरे-धीरे शिक्षण संस्थान अनुशासनहीनता, बदज़ुबानी, मारपीट, और हिंसा का केंद्र बनते जा रहे हैं।
आज गुरु-शिष्य के संबंधों में वो आत्मीयता नहीं रही। अगर अपने शिष्य को सही राह दिखाना, पथभ्रष्ट होने से रोकना, गलती पर टोकना, उसे अनुशासित रहने का सबक सिखाना गुरु के लिए अब गुनाह हो गया है, तो आखिर इन शिक्षा के मंदिरों का औचित्य क्या है? यदि शिक्षण संस्थानों में ऐसा होता रहा, तो ऐसे असुरक्षित वातावरण में गुरु कैसे अपने कर्तब्य का निर्वाह कर पाएगा? क्या संत कबीर जी की ये पंक्तिया सिर्फ़ किताबी छलावा है?
गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढि़ गढि़ काढ़ै खोट
अन्तर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट
गुरु और शिष्य की बीच की तना-तनी का एक कारण यह है कि दोनों कक्षा में एक दूसरे से मिलते तो हैं, परन्तु उनमें संवाद नहीं होता। गुरु की बात शिष्य नहीं समझ पाता और गुरु शिष्य तक नहीं पहुंच पाता। पढ़ाई किताबों से नहीं, बल्कि दिल से होती है। यदि अध्यापक शिष्य को नहीं समझ पा रहा है, तो बेहतर है अध्यापक शिष्य को समझे। अध्यापक और शिष्य का रिश्ता वर्चस्व स्थापित करने का नहीं, बल्कि समझ का एक ज़हनी रिश्ता है।
गुरु-शिष्य के बीच बढ़्ती दूरियों के लिए अभिभावक भी जिम्मेदार हैं। अभिभावक समझते हैं कि शिक्षक महज़ एक कर्मचारी हैं जिसे सरकार मोटी तनख्वाह दे रही है या उसे मोटी रकम फीस के रूप में अदा की जा रही है।वे भूल गए हैं कि गुरु-शिष्य का रिश्ता ग्राहक और दुकानदार का पेशा नहीं है। शिक्षण ऐसा कार्य है, जिसमें शिष्य में ज्ञान के प्रति जुनून व समर्पण की भावना होनी चाहिए और गुरु में अपने ध्येय के प्रति निष्ठा। बच्चों के मन में शिक्षक के प्रति आदर-भाव भरने की बात तो दूर, अभिभावक उनकी शिकायत करने या उनके विरुद्ध मुकद्दमा दायर करने के लिए आतुर रहते हैं। ऐसी स्थिति में बच्चों में गुरु के लिए सम्मान की भावना कैसे विकसित होगी? हालांकि विद्यालयों में एस एम सी गुरु-शिष्य-वालदेन के रिश्तों को सुदृड़ करने में अहम भूमिका निभा सकती है। परन्तु ज़्यादातर एस एम सी के सदस्य या तो निष्क्रीय हैं या फ़िर शैक्षणिक कार्यों को पीछे रख कर राजनीति में ज़्यादा रूची लेते हैं।
घर बच्चे की पहली पाठशाला होती है और मा-बाप पहले अध्यापक। बच्चों के मानस पटल पर घर के माहौल और वहां मिल रही तरबीयत का गहरा असर होता है। जिस अत्यधिक खुले वातावरण में आज बच्चे पल रहे हैं, उसने उनका भला कम और नुक्सान ज़्यादा किया है। अति सर्वत्र वर्जयेत अर्थात किसी भी चीज़ का आवश्यकता से अधिक होना नुकसानदेह होता है। कुछ माता-पिता ’बैस्ट पापा’ या ’बैस्ट मॉम’ कहलाने के चक्कर में अपने बच्चॊ की हर बात या मांग पर ’यैस’ कहने की होड़ में शामिल रहते हैं। इस होड़ में न माता-पिता, न ही बच्चे ये समझ पाते हैं कि ’नो’ शब्द की अहमियत कितनी है। ’यैस’ को सुनते-सुनते बच्चे को ’नो’ सुनना अखरने लगता है। अनुशासन में बंधना उसे बोझ लगने लगता है। ’दरवाज़ा खुला है’ वाली निति पर चलते-चलते पता भी नहीं चलता कि बच्चा कब हाथ से निकल गया और राह से भटक गया। वास्तव में आज उचित समय पर कहा गया ’नो’ कल बच्चे के भविष्य के लिए ’यैस’ साबित होता है। मा बाप को याद रखना चाहिए कि एक चिंगारी को बुझाने के लिए चुल्लु भर पानी भी काफ़ी होता है, मगर जब वह ज्वाला बन जाए, तो दमकल विभाग का टनों पानी भी कुछ नहीं कर पाता। उठते ज़ख्म को वक्त पर दवा न मिले तो वह नासूर बन जाता है। बच्चे की बेहतर परवरिश के लिए डांट व दुलार, फ़टकार व तारीफ़, थपेड़े व पुचकार की ज़रूरत होती है, ताकि उसका विकास एकतरफ़ा न हो। शायर राहत इंदौरी ने सही फ़रमाया है:
नई हवाओं की सोहबत बिगाड़ देती है, कबूतरों को खुली छत बिगाड़ देती है.
जो जुर्म करते हैं इतने बुरे नही होते सज़ा ना देकर अदालत बिगाड़ देती है

Friday, 23 September 2016

वसुधैव कुटुम्बकम

          इंसान क्या था क्या हो गया, कोई हिंदु, कोई मुसलमान हो गया - जब मनुष्य का जन्म होता है, तो वह ‘अल्ला हू अकबर‘ या ‘हर हर महादेव‘ का सिंहनाद करते हुए इस दुनिया में अवतरित नहीं होता। किसी पर भी ये ठप्पा नहीं लगा होता कि अमूक व्यक्ति हिंदू, मुसलमान, सिक्ख या ईसाई होगा। कोई इस तरह की चिप्पी भी नहीं लगी होती कि ये गोरा, ये काला, ये सांवला, ये निम्न जात का, ये ऊंची जात का। ख़ुदा ने तो इंसान पैदा किया है और वो भी एकदम बराबर, परन्तु वो खुद ही बंट गया - कोई बन गया हिंदू, कोई सिक्ख, कोई मुसलमान, कोई ईसाई, कोई ढीमका, कोई फ़्लां। हम इस संसार में उसके बंदे के रूप में आते हैं। मानव की एक ही जात है - इंसानियत और एक ही मज़हब है - मोहब्बत।
          गांधी जी ने कहा है - आंख के बदले आंख एक दिन विश्व को अंधा बना देगा। साबरमती के इस संत ने दया, सत्य और अहिंसा के रास्ते पर चलते हुए देश को बिना खड़ग और ढाल आज़ादी दिलाने का बीड़ा उठाया था और पूरे विश्व को मानवता का संदेश दिया था। भले ही ब्रिटिश प्रधान मंत्री, विन्सटन चर्चिल, ने गांधी जी को कटाक्ष करते हुए ’नंगा फ़कीर’ कहा था, परन्तु इसी नंगे फ़कीर को आज सारा विश्व सहस्राब्दी पुरूष और महात्मा के रूप में शीष नवाता हैं। ऐसा नहीं था कि वे कुर्ता नहीं खरीद सकते थे, मगर कुर्ता न पहन कर उन्होंने मानव को परस्पर दया, संवेदना, प्रेम और सहानुभूति का संदेश दिया था। उन्होंने मानव समाज को अहिंसा को अपनी जीवनशैली बनाने के लिए प्रेरित किया।
          आज के वैमनस्व, नफ़रत, हिंसा और कत्लेआम के दौर में उनका संदेश और भी अहम हो जाता है क्योंकि धर्म, जाति, रंग के आधार पर इतना खून बहा है कि भविष्य हमें कभी माफ़ नहीं करेगा। कहीं कोई लहु के चंद कतरों के लिए तरसता है. तो कहीं वही लहू ख़ुदा के नाम पर सड़कों पर बह रह होता है। कहा जा सकता है:
नफ़रतों का असर देखो जानवरों का बंटवारा हो गया,
गाय हिन्दू हो गई और बकरा मुसलमान हो गया 
                   
          ऐसा नहीं होता कि सूर्य की किरणें किसी पर मधम और किसी पर तेज़ पड़ती हैं और वर्षा की बूंदें किसी पर बरसती हैं और किसी को अछूता रख देती है। चांद का कोई मज़हब नहीं, ईद भी उसकी मनाई जाती है और करवा चौथ भी। रिलायंस हो या वोडाफ़ोन, कोई ऐसा नेटवर्क नहीं जो गोरे रंग वालों को बढ़िया और काले रंग वालों को घटिया सिगनल देते हैं या हिंदूओं के लिए बढ़िया चलते हैं और मुसलमानों के लिए रुक जाते हैं। काले का ख़ून भी लाल, गोरे का खून भी लाल; हिंदू का खून भी लाल, मुसलमान, सिक्ख, ईसाई का खून भी लाल। न हमें ख़ुदा ने बांटा, न हमें प्रकृति ने बांटा, फ़िर इंसान ने इंसान क्यों बांट रखा है? संत कबीर कहते हैं:
अव्वल अल्लाह नूर उपाया, कुदरत दे सब बन्दे,
एक नूर ते सब जग उपज्या कौन भले कौ मंदे
          उर्दू शायर इकबाल ने बहुत ख़ूब कहा है - मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना सद्भाव सभ्यताओं को जोड़ता है, राष्ट्र को बनाता है। जाति, वर्ण, रंग, धर्म, कोई भी हो, वो एक दूसरे से न निम्न हैं, न एक दूसरे से ऊपर। धर्मवाद, रंगवाद, जातिवाद ऐसी बिमारियां है जो केवल मानव को बांटती हैं और सभ्यताओं को विनाश की ओर ले जाती हैं। किसी को ये हक नहीं कि वह जाति, धर्म और रंग के आधार पर किसी का हक छीनें, किसी को अपमानित करे और किसी का कत्ल करे। ये सभी धर्मों के उसुलों के विरुद्ध है। न धर्म टकराते हैं, न जाति, न रंग। टकराती तो वहशत है, टकराती तो संगदिली है। यदि मौहब्ब्त का उद्घोष करेंगे, तो संसार मोहब्बत की रोशनी से जगमगा उठेगा। यदि घृणा का उद्घोष करोगे, तो सारा संसार नफ़रत के अंधेरे में डूब जाएगा। हम इस दुनिया को प्यार-मौहब्बत से एक अचछी जगह बनाने आए हैं। वहशत और दहशत फ़ैलाने वालों का कोई धर्म नही होता। वे न कुरान के हैं, गीता के, गुरुग्रन्थ साहिब के, बाइबल के। वे सिर्फ़ इंसानियत के दुश्मन होते है।
          प्रत्येक मनुष्य को अपने सिद्धांतो पर चलने का अधिकार है, परन्तु समस्या तब पैदा होती है जब हम दूसरों के विश्वास व सिद्धांतों को गलत साबित करने पर तुल जाते हैं। धर्मांध हो कर हम हर दूसरों के विचारों, विश्वास को धर्म के चश्में से देखना आरंभ कर देते है। धर्म के मद में अंधे व्यक्ति को सिर्फ़ अपना ही धर्म उत्तम लगता है और दूसरों का धर्म निम्न।
          हम एक ही जड़ से उत्पन्न हुए पौधे हैं। ऐसा कैसे हो सकता है कि आप जड़ से मोहब्बत करें और पेड़ से घृणा? इंद्रधनुष इसलिए सुंदर और दिलकश लगता है क्योंकि उसमें सात रंगों का अनूठा संगम है। हमारा प्रदेश, हमारा देश, हमारा संसार तभी सुंदर लगेगा अगर यहां विभिन्न, जाति, रंग और धर्म के लोग भ्रातृभाव से रहें। इस भाव को मन से निकाल दें कि दाढ़ी वाले दहशतगर्द और चॊटी वाले काफ़िर हैं।
          तो आओ! 'वसुधैव कुटुम्बकम’ और 'सर्वे भवन्तु सुखिनः’ को अपने जीवन का सिद्धांत बना कर एक कल्याणकारी संसार बनाने का प्रयास करें और मार्टिन लूथर किंग के इन शब्दों को याद रखें - हमें बंधुओं की तरह रहना होगा या फ़िर धूर्तों की तरह नष्ट होना होगा।"
मैं  अमन पसंद हूँ, मेरे शहर में दंगा रहने दो
लाल और हरे में मत बांटो, मेरी छत पर तिरंगा रहने दो