Monday, 4 July 2011

ज़माना

समाज में तीन तरह के लोग होते हैं- ब्यवस्था के साथ चलने वाले, ब्यवस्था से हट कर चलने वाले, ब्यवस्था के विरुद्ध चलने वाले ! मैं चौथी किस्म का आदमी हूं, रहता ज़माने मै हूं पर ज़माने को बदलने की चेष्ठा रखता हूं ! क्योंकि :

ज़माने ने गिराया, तो मैने संभलना सीखा
ज़माने ने रुलाया, तो मैने हंसना सीखा
ज़माने ने फ़िसलाया तो मैने चलना सीखा
इसी तरह ज़माने से ही मैने ज़माने से लड़ना सीखा !

15 comments:

  1. बहुत खूब
    ऐसे लोग बिरले ही मिलते है

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  2. बेहतरीन !
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    कल 06/07/2011 को आपकी एक पोस्ट नयी-पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  3. बहुत खूब ..जो ज़माने से लड़ा वही सफल हुआ ..

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  4. aise hi logon ne jamane ko badal dala hai .badhai

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  5. शुभ कामनाएं ..जगदीश जी .. सार्थक भावाभिव्यक्ति ...यशवंत जी बहुत ही सुन्दर मनभावन लेख एवं कविताओं के संसार से परिचित कराने के लिए अपार अभिनन्दन...
    संगीता स्वरुप जी ..इतने सुन्दर साहित्यिक लिंक प्रदान करने के लिए कोटि कोटि अभिनन्दन...!!!
    सादर !!!!

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  6. वाह, बहुत खूब।चौथे तरह के लोग मुझे भी पसंद हैं।

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  7. बहुत बढ़िया लिखा है आपने! शानदार प्रस्तुती!

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  8. सभी आपके साथ हैं.

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